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17 March, 2012

तन मन को देती जला, रहा निकम्मा ताप-

रमिया का एक दिन.... (महिला दिवस के बहाने)


रमिया खटती रात-दिन, किन्तु मियां अभिशाप।
तन-मन देती वह जला, रहा निकम्मा ताप ।  

रहा निकम्मा ताप, बाप बनता ही रहता ।
तीन ढाक के पात, खुदा की नेमत कहता |

पीता दारू रोज, निकाले हर दिन कमियां |
सहती जाए बोझ, रहे चुप लेकिन रमिया ||

10 comments:

  1. मार्मिक........
    कटु सत्य भी...
    सादर

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  2. बहुत हृदयस्पर्शी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  3. गहरे अर्थ और दर्द

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  4. कविवर तेरी कुंडली, गहरा जख्म दिखाये
    आह!आह! ही बोलता, वाह! कही ना जाय।

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  5. मन के हारे हार है मन के जीते जीत ,मन जीते जग जीत.

    मन से आवे काया में भैया, जी हर रोग

    मन को मांजो रहो निरोग .

    यही हकीकत रमियाओं की है .

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