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24 March, 2012

माली हालत देख के, कर माली का काम

   गंभीर हास्य

संध्या को कर वन्दना, रात न क्रंदन होय ।
भक्ति से भोजन मिले, होय भोर सुख सोय ।।

दिन-भर की आवारगी, हो जाएगी माफ़ ।
साँझ परे घर घुस करो, सारे बर्तन साफ़ ।।

सुबह उठे आलस हटे, खटिये घंटे चार ।
 बेड पर ही टी सर्व हो, झाड़ू पोछा मार ।।

माली हालत देख के, कर माली का काम ।
ड्युटी से पहले ख़तम, होवे काम तमाम  ।।

बीस साल तक प्यार से, गली हमेशा दाल ।
भीगी बिल्ली बन रहो,  बेटे  देते  ताल ।। 

बेटे बेटी की तरफ, नहीं उठाना आँख ।
खलल पड़ी तफरीह में,  लागे बट्टा शाख ।।

7 comments:

  1. :-)

    कर भला...हो भला....
    इस कविता की तारीफ करूँ भी तो कैसे!!!!

    सादर.

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  2. कई रंगों से युक्त जीवन की दिनचर्या !

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  3. दे दी है प्रभु आपने, कितनी अच्छी सीख ।

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  4. बहुत कीमती सीख है, सच्चे सम्यक बोल।
    हसी हसी में खोल दी, कितनों की ही पोल।

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    Replies
    1. आभार भाई जी
      बदन ढोल सा हो चुका, अन्दर पोलमपोल |
      उनके तेवर से हुई, सम्यक बुद्धि गोल |

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