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23 March, 2012

दफ़्न करना जरा, साथ में इक कलश-


मुझे नहीं पता यह क्या हो गया मुझको --
क्षमा सहित यह तुरंती ।
डाकिया डाकुओं से, बुरा हो गया ।
लूट लेता है तन्हाई, आकर यहाँ ।
 चिट्ठियाँ क्या पढूं , हाल मालुम हमें 
या खुदा मैं रहूँ आज जाकर कहाँ ।। 

मैं नकारा नहीं था कभी भी प्रभु
खुब कमाया खिलाया-पिलाया सदा ।
आज मशगूल हैं मद पिए मस्त वे 
देव किस्मत में अपने, लिखा क्या बदा ।।

केश काला नहीं, तन करारा नहीं 
दिल में बैठे रहे, क्यूँ निकाला नहीं  ।
हर्ट की सर्जरी पास-बाई किया 
मूंग दलती रहो,  कुछ बवाला नहीं ।

वसीयत तुम्हारे लिए कर दिया 
चार कमरों की बोतल तुम्हारी हुई ।
दफ़्न करना जरा, साथ में इक कलश 
मस्त हो सो सके, देह हारी हुई ।
 

6 comments:

  1. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!
    नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाएँ!

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  2. लाज़वाब है यह तुरंती /तुरता ग़ज़ल .

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  3. तुरंती पर फुरसतिया.......

    चिट्ठियों का अब जमाना है कहाँ
    और अपना भी ठिकाना है कहाँ
    मेल, एसेमेस के चालू दौर में
    डाकिये का आना-जाना है कहाँ.

    नाकारा समझना -फितरत उसकी
    आज तलक मैं ही-जरुरत उसकी
    जो था वो हूँ वही कल भी रहूंगा
    अब तबीयत उसकी,किस्मत उसकी.

    हाय-बॉय किया, 'बाई' पास आ गई
    रफ्ता- रफ्ता निकट बाई चांस आ गई
    'बाई पास' कराना हमें पड़ गया
    काले केशों पे भी अब उजास आ गई.

    अंडर - ग्राउंड पाइप - लाइन बिछवा देंगे
    मयखाना कर गये वसीयत , तोहफा देंगे
    मिस्ड कॉल कर देना ,जब हो पार्टी-शार्टी
    जितनी चाहो, पाइप से हम भिजवा देंगे.

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    Replies
    1. थ्री जी से बचना जरा, दिख जायेगा रंग |
      आँखों की मस्ती कहीं, करे तपस्या भंग ||

      उनकी कृपा-प्रताप है, ढोते अब तक बोझ |
      माने मन से देवता, चलें रास्ते सोझ ||

      अगर हकीकत को करे, निर्मल बुद्धि क़ुबूल |
      जीवन यात्रा हो सफल, सीधा सरल उसूल ||

      कम्बल में ही घी पिए, लेकिन कभी-कभार |
      दीवाली में देर है, होली होती पार ||

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    2. थ्री जी से बचना जरा, दिख जायेगा रंग |
      आँखों की मस्ती कहीं, करे तपस्या भंग ||

      उनकी कृपा-प्रताप है, ढोते अब तक बोझ |
      माने मन से देवता, चलें रास्ते सोझ ||

      अगर हकीकत को करे, निर्मल बुद्धि क़ुबूल |
      जीवन यात्रा हो सफल, सीधा सरल उसूल ||

      कम्बल में ही घी पिए, लेकिन कभी-कभार |
      दीवाली में देर है, होली होती पार ||

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