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25 March, 2012

छंद दिखे छल-छंद जब, संध्या जनित प्रभाव-

दोहे  
छंद दिखे छल-छंद जब, संध्या जनित प्रभाव।
दृष्ट जलन्धर की गई, तुलसी प्रति दुर्भाव ।।

पुरंधरी पुरुषार्थ पर, रह जाती चुपचाप ।
  बंध्या का अपदंश सह, सहती रहती ताप ।।

सास रही कल तक बधू , जी में न संतोष ।
कुल की नभ्या बन गई, सुनो गर्व उद्घोष ।।

 मोटा दाहिज मिल गया, कुलक्षणा जो पूर्व ।
घर-भर की प्यारी बनी, दिव्या हुई अपूर्व ।।

पद पर पदतल पाय के, ढूंढे सच्चा भाव ।
रज-कण छाये मन-पटल, वो पहले बिलगाव ।। 

गन्दाजल होती गजल, गन्दी हो जब सोंच ।
वाह वाह कर दो सखे, पाओगे उत्कोच ।।  

9 comments:

  1. गन्दाजल होती गजल, गन्दी हो जब सोंच ।
    वाह वाह कर दो सखे, पाओगे उत्कोच ।।
    अर्थ छटा मुखरित है .

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  2. लो जी कर दिया वाह वाह पर इन खूबसूरत दोहों के लिये ।

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  3. चुप रहकर हां में सिर हिलाना ही विकल्प छोड़ा आपने।

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  4. कमाल के दोहे ... जादू है आपकी लेखनी में ...

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  5. भांति भांति के दर्द हैं, भांति भांति के मर्म।
    जो देखा वह कह दिया, यही कवि का धर्म।।

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  6. बहुत खूब! लाज़वाब और सटीक दोहे...

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  7. जादू वही जो सर चढ़ बोले ,दोहा हो जाए रविकर जो बोले .

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