Follow by Email

05 April, 2012

श्री संतोष जी त्रिवेदी का आभार : मिली प्रेरणा

 आषाढ़ और भाद्रपद

रहे हाथ दोउ मींज, हुलकते आश्विन रानी

लाग-डांट आषाढ़ में, मास भाद्रपद बीच ।
हूर वास्ते लड़ रहे, विकट पडोसी नीच ।

विकट पडोसी नीच, करे सब पानी पानी ।
रहे हाथ दोउ मींज, हुलकते आश्विन रानी ।

कीड़े जहर पतंग, तंग दूल्हा हो जाता ।
कृष्ण जन्म को छोड़, भाद्र तू अशुभ कहाता ।।


अगहन  / मार्गशीर्ष 

रहा शीर्ष पर पूर्व, साल का पहला महिना
गहन सोच में पड़ गया, मार्ग शीर्ष पर आय ।
कैसे अव्वल बन रहूँ, चिंता रही सताय ।

चिंता रही सताय,  जोड़ियाँ बड़ी बनाईं।
प्राणिमात्र को भाय, लताएँ भी मुस्काई ।

करे कठिन नित कर्म, वेद का है यह कहना ।
रहा शीर्ष पर पूर्व, साल का पहला महिना ।।


पौष 

वृद्धों पर आघात, हुई है प्राकृत निष्ठुर

पूस-फूस सा उड़ रहा, ठंडी लम्बी रात ।
घनी धुंध में निकलती, चोरों की बारात ।

चोरों की बारात, बरसता पानी पत्थर।
वृद्धों पर आघात, हुई है प्राकृत निष्ठुर ।

होंय नहीं शुभ काम, घाम बिन व्याकुल जीवन ।
करो ओढ़ आराम, राम का करिए वन्दन ।

 बैशाख और मेघा / माघ 

पर नन्दन वैशाख,  नहीं मेघा को  प्यारा


मेघा को ताका करे, नाश-पिटा बैसाख ।
करे भांगड़ा तर-बतर, बट्टा लागे शाख ।
बट्टा लागे शाख, मुटाता जाय दुबारा ।
पर नन्दन वैशाख,  नहीं मेघा को  प्यारा ।
मेघा ठेंग दिखाय, चिढाती  कहती  घोंघा ।
ठंडी मस्त बयार, झिड़कती उसको मेघा ।।   

 चित्रा (चैत्र) 

फगुनाहटी सुरूर, त्याग अब कहती मित्रा


चित्रा के चर्चा चले, घर-आँगन मन हाट ।
ज्वार जवानी कनक सी, रही ध्यान है बाँट ।
रही ध्यान है बाँट,  चूड़ियाँ साड़ी कंगन ।
जोह रही है बाट, लाट होंगे मम साजन ।
फगुनाहटी सुरूर, त्याग अब कहती मित्रा ।
विदा करा चल भोर, ताकती माती-चित्रा ।।

आश्विन और कार्तिक  

पूजा का माहौल, प्रेम रस भक्ति मिला दे

चूमा-चाटी कर रहे,  उत्सव में पगलान ।
डेटिंग-बोटिंग में पड़े, रेस्टोरेंट- उद्यान ।
रेस्टोरेंट- उद्यान, हुवे खुब कसमे-वादे ।
पूजा का माहौल, प्रेम रस भक्ति मिला दे ।
नव-दुर्गा आगमन, दिवाली जोड़ा घूमा ।
पा लक्ष्मी वरदान, ख़ुशी से माथा चूमा ।। 

फागुन और श्रावणी 

तीन मास संताप, सहूँ मै कैसे निर्गुन

फागुन से मन-श्रावणी,  अस्त व्यस्त संत्रस्त
भूली भटकी घूमती,  मदन बाण से ग्रस्त । 
मदन बाण से ग्रस्त, मिलन की प्यास बढाये ।
जड़ चेतन बौराय, विरह देहीं सुलगाये ।
तीन मास संताप, सहूँ मै कैसे निर्गुन ?
डालो मेघ फुहार, बड़ा तरसाए फागुन ।।
 

आश्विन और ज्येष्ठ 

पर आश्विन इठलाय, भाव बिन समझे कुत्सित

आश्विन की शीतल झलक, ज्येष्ठ मास को भाय।
नैना तपते रक्त से, पर आश्विन  इठलाय ।
पर आश्विन इठलाय, भाव बिन समझे कुत्सित।
मर्यादित व्यवहार, ज्येष्ठ से हरदम इच्छित ।
मेघ देख कर खिन्न, तड़पती तड़ित तपस्विन ।
भीग ज्येष्ठ हो शांत , महकती जाती आश्विन ।।

4 comments:

  1. हर माह की काव्यमय प्रस्तुति,उसके परिचय के साथ !
    बहुत बढ़िया बारहमासा !

    ReplyDelete
    Replies
    1. बहुत ख़ूबसूरत, बधाई.

      Delete
  2. अद्भुत शैली। हर माह के समेट लिया है अपने काव्य के फलक पे।

    ReplyDelete