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08 April, 2012

हा दै या

काया कैन्सर ।
कुण्डली रूप धर ।
दीखे इधर ।।


दर्द जिस्म का ।
जाल जगत पर--
किस्म किस्म का ।।

 
चले डरके
हाय-तोबा करके । 
आंसू भरके ।।

हैं धमकाते 
जबरदस्ती आते 
क्यूँ तड़पाते ।।


 पत्नी की सौत
तू है अगर मौत
तो लगा गले ।।


गाली-गलौज ।
बिजबिजाते हौज -
करे हैं मौज ।



5 comments:

  1. सार्थक पोस्ट, आभार.

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  2. बहुत सुन्दर वाह!
    आपकी यह ख़ूबसूरत प्रविष्टि कल दिनांक 09-04-2012 को सोमवारीय चर्चामंच पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

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  3. बढ़िया हायेकु ...........

    भावपूर्ण भी...............

    सादर.

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