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19 April, 2012

प्यास बुझी ना बावली, ले ले बच्ची गोद -

प्यास बुझी ना बावली,  किया वारुणी पान ।
हुआ बावला इस कदर, भूल गया पहचान ।।  

प्यास बुझी ना बावली, देखा जलधि अथाह । 
लेकिन अति लावण्यता, रविकर उठा कराह ।। 

प्यास बुझी ना बावली, बैठ घास पर जाय ।
ओस रोस करके उडी, जाती  हँसी उड़ाय।।

प्यास बुझी ना बावली, मंदिर में घुसपैठ ।
चरणामृत का पान कर, प्रभु चरणों में बैठ  ।।

प्यास बुझी ना बावली, होता गया अधीर ।
धीरे धीरे हो गई, पर्वत जैसी पीर ।।

प्यास बुझी ना बावली, करता रहा उपाय।
वृद्धाश्रम को देख के, रविकर गया अघाय | 

प्यास बुझी ना बावली, लेता बच्ची गोद |
भूख-प्यास सारी मिटी, घर में मंगल-मोद ||

8 comments:

  1. 'प्यास बुझी ना बावली' की टेक लेकर कई बातों को ठिकाने लगा दिया है !
    मस्त प्रयोग करते हो !

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  2. प्यास बुझी ना बावली, करले इक तदवीर ।
    वृद्धाश्रम जा घूम ले, पी ले उनकी पीर ।

    आपका संवेदनशील ह्रदय, समाज को बहुत कुछ दे जाएगा !
    शुभकामनायें आपको !

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  3. प्यास बुझी ना बावली, प्रभु चरणों में बैठ ।
    चरणामृत का पान कर, अपने कान उमेठ ।।
    वाह...क्या बात कही है...अद्भुत बधाई स्वीकारें

    नीरज

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  4. बहुत ही सुंदर प्रयोग ...

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  5. प्यास बुझी ना.....
    एक सार गर्भित प्रयोग
    शुभकामनाएँ

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  6. बहुत ही बढ़िया सर!


    सादर

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  7. प्यास बुझी ना बावली,कर-कर के तदवीर
    किए जतन पर मिटी नहीं,पर्वत होती पीर

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  8. प्यास बुझी ना बावली, ले ले बच्ची गोद ।
    अश्रु-कणों का पान कर, जीवन कर सामोद ।।

    ....बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति....

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