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11 April, 2012

रहता रविकर मस्त, गधे से दुनिया जलती-

नई-गलती 

गलत कभी भी ना करें, केवल दो इंसान ।
महा-आलसी का-हिली, बेवकूफ नादान । 

बेवकूफ नादान, समझ न पाता गलती ।
रहता रविकर मस्त, गधे से दुनिया जलती ।

 महा-आलसी काम, करे ना खुद से कोई ।
फिर गलती बदनाम, कहाँ से क्यूँकर होई ।।

 

 

23 June, 2011

को प्रकाशित

  पुरानी गलती

गलती कर कर के बने, महा-अनुभवी लोग |

शान्ति-प्रिय होते सदा, जिनको प्रिय सम्मान |
करते छल हद तोड़  कर,  माया जिनके प्राण | 
माया   जिनके   प्राण,    डुबाते   सारे   रिश्ते |
शांतिप्रिय  जो लोग,  आज  के  वही फ़रिश्ते |
पर रविकर यह शांति,  नहीं श्मशान घाट की |
करता पूजा कर्म,  जिन्दगी जिए ठाठ  की || 

*          *          *          *           *           *

गलती कर कर के बने, महा-अनुभवी लोग |
महाकवि बनता कोई, सहकर  कष्ट वियोग |
सहकर कष्ट वियोग, गलतियाँ  करते जाएँ  |
किन्तु रहे यह ध्यान, उन्हें फिर न दोहराएँ |
कह रविकर सन्देश, यही है  श्रेष्ठ-जनों का  |
पंडित "शास्त्री" संत, आदि सब महामनों का || 

&          &             &              &          & 

बिकता है हर आदमी, भिन्न-भिन्न है दाम |
सच्चा मोल चुकाय वो, पड़ता जिसको काम ||
पड़ता  जिसको  काम , खरीदे  देकर  पैसा  | 
करता  न  सम्मान,   करे  बदनाम   हमेशा |
पर रविकर यदि प्यार, ख़रीदे तुम्हें तोल के -
बिक जाना तुम यार, वहाँ पर बिना मोल के ||

4 comments:

  1. गलती करे तो कोई अपराध नहीं,पर जानबूझकर जो करे वह तो अपराधी ही है !

    बढ़िया विचार !

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  2. अपना क्या बताएं रविकर साहब। महाआलसी और काहिल खुद को समझना नहीं चाहता और लोग समझदार मानना नहीं चाहते!

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  3. बिकता है हर आदमी, भिन्न-भिन्न है दाम
    beautiful poem

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