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01 May, 2012

दगाबाज यह जीव, घूमता हर महफ़िल में-

कुंडली 

 
खिड़की झिडकी खा रही, काँच उभारे अक्स ।
परदे गरदे से भरे,  नहीं रहे हैं बख्स । 

नहीं रहे हैं बख्स, बसाया कैसे दिल में ?
दगाबाज यह जीव, घूमता हर महफ़िल में ।

घुसता धक्का-मार, खिड़कियाँ देखे भिड़की ।
जाए काँच बिखेर, थपेड़े खाए खिड़की ।।

दोहा 

 दिल-दर्पण के काँच को, लगी धाँस मन-जार ।
 तन-खिड़की झिडकी गई, भंगुर छिटक अपार।।

4 comments:

  1. इसके अर्थ में कुछ तो व्यावहारिक पक्ष है कुछ आध्यात्मिक भी।

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  2. अब इसका मौसम भी आ रहा है...!
    बिलकुल ठीक पकड़ा !

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  3. दिल-दर्पण के काँच को, लगी धाँस मन-जार ।
    तन-खिड़की झिडकी गई, भंगुर छिटक अपार।।
    बढ़िया प्रस्तुति रविकर जी की .(.कृपया यहाँ भी पधारें - )

    कैंसर रोगसमूह से हिफाज़त करता है स्तन पान .
    http://kabirakhadabazarmein.blogspot.in/2012/05/blog-post_01.html

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  4. क्या बात है..बहुत अच्छी रचना...

    नीरज

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