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04 May, 2012

बड़ी सभा की सीन हूँ मैं-

 (1)
वे सर्प सारे झूमते --
फुफकारते--
डस रहे -
चिघ्घाड़ते
नाचते--
धिक्कारते--
बज रही सी बीन हूँ मैं ??
गमगीन हूँ मैं ?
 (2)
दिन ढला
मद चढ़ा  
बोतलें खुली
बत्तियां जली
मदमाते-
गुर्राते
डगमगाते
चखने लगे
नमकीन हूँ मैं ।
गमगीन हूँ मैं ।
(3)
भैंस जाती रही-
पनियाती रही ।
बहस जारी है
भारी तैयारी  है ।
लटके झटके
हुंकारते
चिल्लाते
ठोकते 
भौंकते  
बड़ी सभा की 
सीन हूँ मैं
गमगीन हूँ मैं ।।

2 comments:

  1. चिल्लाते
    ठोकते
    भौंकते
    beautiful poem

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  2. बोतलें खुली
    बत्तियां जली
    मदमाते-
    गुर्राते
    डगमगाते
    चखने लगे

    वाह...बेहतरीन रचना...

    नीरज

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