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05 May, 2012

नदी नीर बिन, लक्ष्य-तीर बिन, मन शरीर बिन आगे, भागे

जीवन नैया कुशल खेवैया, 
फिर भी नाव बढे ना आगे ।

मन आशंका तन की लंका,
 पतवार शत्रुवत लागे, दागे ।।


रब ! कब पानी की मनमानी , 
खत्म होयगी ताकें,  जागे ।

नदी नीर बिन, लक्ष्य-तीर बिन, 
मन शरीर बिन आगे, भागे ।।

11 comments:

  1. नया प्रयोग....सराहनीय !

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  2. बढ़िया प्रतुती है .

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  3. क्या बात है!!
    आपकी यह ख़ूबसूरत प्रविष्टि कल दिनांक 07-05-2012 को सोमवारीय चर्चामंच-872 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

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  4. bahut hi behtreen prastuti----
    bahut bahut achhi lagi
    poonam

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  5. बहुत सुन्दर शब्द रचना बहुत २ बधाई |

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  6. बहुत कुछ बन जायेगा
    आगे आगे देखो जाके ।

    बहुत सुंदर !!

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  7. बहुत सुन्दर शब्द, रचना बधाई |

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  8. नदी नीर बिन, लक्ष्य-तीर बिन,
    मन शरीर बिन आगे, भागे ...

    Awesome...

    .

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  9. दूध खीर बिन, नयन नीर बिन
    हृदय पीर बिन, रहें अभागे
    लाज चीर बिन,देश वीर बिन
    अपनी महिमा त्यागे,त्यागे

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  10. नदी नीर बिन, लक्ष्य-तीर बिन,
    मन शरीर बिन आगे, भागे
    जीवन का सत्य

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