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03 May, 2012

वो दुश्मन घर उत्तीर्ण हुई -

(1)
वात पित्त कफ बन गए, द्वेष प्रपंच घमंड ।
धन-दौलत कर ली जमा, कर समाज शत-खंड |

सब कुछ लिया बटोर | 

चल दिल्ली की ओर ।

खादी तन-पर डाल के, हाँक रहा बरबंड ||

(2)
किसकी बातें करता है कवि,कल्पनाशक्ति जब क्षीण हुई ।
सम्वेदन-शून्य हुई काया, वह ज्योती-तीक्ष्ण विदीर्ण हुई ।

जीवन में वीरानी छाई ।
 उनकी याद बिराने आई ।
   
गाने और बहाने क्या, वो दुश्मन घर उत्तीर्ण हुई ।।  

7 comments:

  1. सुन्दर अवलोकन है आपका !

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  2. निःशब्द हूँ आपकी रचनाधर्मिता देखकर!
    बहुत बढ़िया!

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  3. Bahut hi sundar prastuti .. Ravikar ji..

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  4. सही जा रहे हो ! वाह ! वाह !

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  5. बहुत बढ़िया प्रस्तुति!
    आपकी प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर लगाई गई है!
    चर्चा मंच सजा दिया, देख लीजिए आप।
    टिप्पणियों से किसी को, देना मत सन्ताप।।
    मित्रभाव से सभी को, देना सही सुझाव।
    उद्गारों के साथ में, अंकित करना भाव।।

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