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13 May, 2012

मांगें मंदी चीज, इधर दुनिया में मंदी-

मंहगाई से त्रस्त जन, असफल सब तद्-बीज ।
गुणवत्ता उत्कृष्टता, मांगें मंदी चीज ।

मांगें मंदी चीज, इधर दुनिया में मंदी ।
अर्थव्यवस्था बैठ, होय छटनी सह बंदी ।

रविकर कैसा न्याय, एक को मंदी खाई ।
निन्यान्नबे हलकान, बड़ी जालिम मंहगाई ।।

2 comments:

  1. क्या बात है गुप्ता जी

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