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16 May, 2012

जला श्मशान में भीषण, खड़े खुश हाथ वो सेंके-


रही थी दोस्ती उनसे, गुजारे थे हंसीं-लम्हे
उन्हें हरदम बुरा लगता, कभी जो रास्ता छेंके ||

सदा निर्द्वंद घूमें वे, खुला था आसमां सर पर
धरा पर पैर न पड़ते, मिले आखिर छुरा लेके ||



मुहब्बत को सितम समझे, जरा गंतव्य जो पूंछा-
 गंवारा यह नहीं उनको, गए मुक्ती मुझे देके ।।

बसे हर रोम में मेरे, मुकम्मल चित्र पर ढूंढें -
जुबाँ काटे गला काटे, कलेजा काट कर फेंके |।

उड़ें अब मस्त हो हो कर , निकलता आज जब काँटा-
जला श्मशान में भीषण, खड़े खुश हाथ वो सेंके ||


 

8 comments:

  1. रविकर जी ... बहुत कुछ कहती रचना .. मुझे साधारण पंक्तियाँ नहीं लगीं. जीवन के कई पहलु समेटे हुए पंक्तियाँ. अच्छी लगीं

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  2. समाज और प्रेम...चाहे जिसमें जोड़ लो,बढ़िया बिम्ब !
    चलता-फिरता चित्र भी प्रभावित कर रहा है !

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  3. aap to kamal ke rachnakar hai chhoti ki kavita me itni badi baat kah jate hai..

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  4. बहुत कुछ कहती रचना ....मुखर रचना

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  5. वक्त वक्त की बात रहती है
    सब धरा रह जाता है यहीं ...
    फिर कोई ख़ुशी मनाये या गम..
    बढ़िया विचारोतेजक रचना

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  6. फोटो इतनी अच्छी लगायी है
    रचना ऊपर से जोरदार बनाई है ।

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  7. बशाई भाई साहब .बोलती तस्वीर मुखर रचना .समकालीन प्रसंग .अच्छी रचना की सब शर्तें पूरी करती है यह रचना .

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