Follow by Email

26 May, 2012

स्नेह-समर्पण कर दिया-


प्रेम और विश्वास का, होय नहीं व्यापार ।
दंड-भेद से ना मिले, साम दाम वेकार ।।

स्नेह-समर्पण कर दिया, क्यों कुछ मांगे दास ?
निज-इच्छाएं कर दफ़न, मत करवा परिहास ।।

5 comments:

  1. प्रेम कहां कुछ मांगता है । मांगता है तो निस्वार्थ चाहत ।

    ReplyDelete
  2. बहुत ही अच्छी प्रस्तुति । आपका मेरे पोस्ट पर आगमन मेरे मनोबल को बढ़ाता है । इसलिए अनुरोध है कि मेरे नए पोस्ट "कबीर" पर आकर मुझे प्रोत्साहित करें । धन्यवाद ।

    ReplyDelete
  3. Thode se shabdo me bahut kuch kah diya..
    Khubsurat..

    ReplyDelete