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30 May, 2012

मन-रेगा तन-रेगा -

(1)
मन-रेगा रेगा अरे, तन रेगा खा भांग  | 
रक्त चूस खटमल करें, रक्तदान का स्वांग |

रक्तदान का स्वांग, उदर-जंघा जन-मध्यम |
उटपटांग दो टांग, चढ़े अनुदानी उत्तम |

पर हराम की खाय, पाँव हाथी सा फूला |
जन जीवन अलसाय, तथ्य हर गाँव कबूला ||


(2)

रेगा होते जा रहे, लाभुक और मजूर |
बैठ कमीशन खा रहे, बिना काम भरपूर |
http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/9/91/Kettenbagger_CAT_325C_LN.jpeg
बिना काम भरपूर, मशीनें करैं खुदाई |
चढ़े चढ़ावा दूर, कहीं कागदे कमाई |


वैसे ग्राम-विकास, करे यूँ खूब नरेगा |
किन्तु श्रमिक अलसात, खेत-घर आधे रेगा ||




7 comments:

  1. बिना काम भरपूर, मशीनें करैं खुदाई |
    चढ़े चढ़ावा दूर, कहीं कागदे कमाई |

    ....बहुत सुन्दर और सटीक अभिव्यक्ति...

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  2. बहुत बढ़िया,नरेगा की कहानी !!

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  3. सुंदर सामयिक अभिव्यक्ति....

    हवा हवाई रच रही, हवा महल सरकार।
    मनरेगा सँग रेंगकर, मन रे गा मल्हार।

    सादर

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  4. वैसे ग्राम-विकास, करे यूँ खूब नरेगा |
    किन्तु श्रमिक अलसात, खेत-घर आधे रेगा ||.sundar....saadar

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  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    पोस्ट साझा करने के लिए आभार!

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  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति

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  7. अच्छी बखिया उधेड़ी आपने।

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