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02 June, 2012

आय मोहन अधनंगे -

 छप्पय 
हुवे हजारों साल, डाल पीताम्बर आये ।
कुरू-क्षेत्र में जाय, महाभारत लड़वाए ।  
हुवे डेढ़ सौ साल, आय मोहन अधनंगे ।
सत्य अहिंसा ढाल, भगाए धूर्त लफंगे ।

अभी आठ-नौ साल में, लौट मन-मोहन आया ।
अर्थ व्यर्थ कब का हुआ, रोज पब्लिक  लुटवाया ।।

8 comments:

  1. हीरे जैसी धार, कलम ने इनकी पाई।
    कह देते सन्नाट, न कोई बात छुपाई।
    शेर रहे या बाघ, निडर हो कान मरोड़े।
    खींचे सबकी खाल, न 'फैजाबादी' छोड़ें।
    यही धर्म हर कवि निभाए, जगा चले इस देश को।
    समय पर तिरशूल उठा कर, धारे शंकर वेश को।


    सादर।

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  2. बहुत दिनों के बाद छप्पय पढ़ा। अब तो ये सब विधा गायब ही होते जा रही हैं।

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  3. सुंदर व्यंग्य भरी कविता !!

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  4. मन मोहन ने तो मन को उचाट दिया ।
    पर आपकी कुडली जबरदस्त ।

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