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08 June, 2012

दिल्ली में संतोष जी, मिले मित्र अविनाश

साइबर कैफे लखनऊ से -

दिल्ली में संतोष जी, मिले मित्र अविनाश ।
इन दोनों परिवार की, बातें बेहद ख़ास ।
बातें बेहद ख़ास, मटरगस्ती में पहला ।
दीदी देती डांट, मगर मोबाइल टहला । net-surfing
एक्टिंग में बेशर्म, लगे है भीगी बिल्ली ।
रविकर के मानिंद, हिलाता  घूमे दिल्ली  ।।

धमाचौकड़ी थी मची, बच्चे बनते मित्र ।
खेलकूद खेले खले, खींचे चित्र -विचित्र ।
खींचे चित्र विचित्र, बना मामा का रिश्ता ।
लेते हाथों-हाथ, समझ के भला फ़रिश्ता ।
रविकर दे आशीष, सदा बढ़ते ही जाएँ ।
मिले पूर्ण संतोष, लक्ष्य अपने सब पायें ।।




शेष धनबाद से 

7 comments:

  1. यार बिना चैन कहाँ रे................

    सुन्दर

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  2. आज आपकी दीदी भी लखनऊ में हैं ...:-)

    ...रविकर कहे जलेबी और खिलाये भी ,
    ऐसा दिन दिल्ली में क्यों रोज़ न आये जी ?

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  3. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  4. भारत दर्शन बनाम ब्‍लॉग/ब्‍लॉगर दर्शन। रविकर जी के दर्शनों की साध पूरी हुई।

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  5. अन्नाभाई की बात बता रहे हैं
    बोतल क्यों नहीं दिखा रहे हैं
    बिना बोतल वो अब सोने भी
    कहाँ जा पाते हैं
    सपने में भी बोतल बोतल चिल्लाते हैं।

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