Follow by Email

11 June, 2012

उफ़ !! धनबाद की गर्मी -


field_drying.jpg

झुलसे खर-पतवार हैं, सूख चुकी जब मूंज ।
पड़ी दरारें खेत में, त्राहिमाम की गूँज ।

त्राहिमाम की गूँज, गगन बादल दल खोजे ।
दल-दल घोंघे भूंज, खोलते खाके रोजे ।

सावन सा वन होय, रोय रा-वन की लंका ।
बादल का ना बाज, आज तक मारू  डंका ।।
endless_fires_14.jpg
endless_fires_15.jpg

14 comments:

  1. अब तो इस हुंकार से तापवृद्धि औ होय,
    गरम चाय से मार दो,सत्तू धरो बिलोय !

    ReplyDelete
  2. सूखी धरती की प्यास को रूपायित करती पोस्ट .

    ReplyDelete
  3. वाह...
    सन्देश और निवेदन दोनों ही हैं इस कुण्डलिया में!

    ReplyDelete
  4. धनबाद नहीं आज तो सभी तरफ ये आलम है गर्मी का ...
    फोटो मस्त हैं ..

    ReplyDelete
  5. कर रहे है सब इंतज़ार सावन की
    आएगी, ऋतू सबके मनभावन की

    ReplyDelete
  6. बहुत सुंदर एवं सार्थक रचना...

    ReplyDelete
  7. न होवे गर्मी तो कैसे पिओगे सत्‍तू
    बन जाओगे चाहोगे नहीं तो बजरबट्टू

    ReplyDelete
  8. सारा देश ‘धनबाद’ बना हुआ है अभी तो... एक समान गर्मी....
    सुंदर रचना...
    सादर।

    ReplyDelete
  9. गर्मी पर सटीक रचना..वाह

    नीरज

    ReplyDelete
  10. बहुत बढ़िया

    ReplyDelete
  11. मित्रों चर्चा मंच के, देखो पन्ने खोल |

    पैदल ही आ जाइए, महंगा है पेट्रोल ||

    --

    बुधवारीय चर्चा मंच

    ReplyDelete
  12. शब्द-शब्द संवेदना भरा ....बहुत सुन्दर एवं मर्मस्पर्शी रचना !

    ReplyDelete
  13. गरमी की झुलस यहां तक पहुंच गई रविकर जी ।

    ReplyDelete