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28 September, 2012

भगवान् राम की सहोदरा (बहन) : भगवती शांता परम-18

सर्ग-4
भाग-6  
 शांता-सृंगी विवाह

इन्तजार इस व्याह का,  करते राजा-रंक | 
अति लम्बे दुर्भिक्ष का, झेला दारुण-डंक ||

इन्तजार की इन्तिहा, इम्तिहान इतराय ।
गरह कटे अब तो सही, विरह सही नहिं जाय ।।


वरुण देव करते रहे, मिटटी महा पलीद |
रिस्य रिसर्चर सृंग से, जागी अब उम्मीद ||

शांता के सद्कर्म से, होवे जग कल्याण |
तड़प-तड़प जीते रहे, बच जायें जो प्राण ||

रीति-कर्म होने लगे, संस्कार व्यवहार |
पाणिग्रहण के निमित्त अब, जुटती भीड़ अपार ||

भंडारे में आ रहे, दूर दूर से लोग |
पांच दिनों से खा रहे, सारे नियमित भोग ||

सृन्गेश्वर में सज गई, शंकर सी बारात |
परम बटुक लेकर चला, वर्षा की सौगात ||

दूल्हे संग इक पोटली, रही बगल में साज |
तरह तरह के साज से, गुंजित मधु-आवाज ||

दस बारह दिन से यहाँ,  गरजें बादल खूब |
बेमतलब के नाट्य से, रही शांता ऊब ||

गरज हमारी देख के,  गरज-गरज घन खूब ।
बिन बरसे वापस हुवे, धमा-चौकड़ी ऊब ।
धमा-चौकड़ी ऊब, खेत-खलिहान तपे हैं ।
तपते सड़क मकान, जीव भगवान् जपे है ।
त्राहिमाम भगवान्, पसीना छूटे भारी ।
भीगे ना अरमान, भीगती देह हमारी ।। 


जैसे चंपा नगर में, करता वर परवेश |
भूरे बादल छा गए, ज्यों ताकें आदेश ||

सादर अगवानी करे, राजा राजकुमार |
विविन्डक ऋषि का सभी, प्रकट करें आभार ||

होय मंगलाचार इत, उत पानी बुंदियाय |
दादुर टर-टर बोलते, जीव-जंतु हर्षाय ||

रचना ईश्वर ने रची, तन मन मति अति-भिन्न |
प्राकृत के विपरीत गर, करे खिन्न खुद खिन्न |

इधर बराती चापते, छक के छप्पन भोग |
परम बटुक ढूंढे उधर, अच्छा एक सुयोग ||

साधारण से वेश में, पीयर धोती पाय |
धीरे धीरे शांता, बैठी मंडप आय ||

दृष्टि-भेद से उपजते, अपने अपने राम |
सत्य एक शाश्वत सही, वो ही है सुखधाम ।।


जमे पुरोहित उभय पक्ष, सुन्दर लग्न विचार |
गठबंधन करके  भये,   फेरे को तैयार ||

पहले फेरे के वचन,  पालन-पोषण खाद्य |
संगच्छध्वम बोलते, बाजे मंगल वाद्य ||

स्वस्थ और सामृद्ध हो, त्रि-आयामी स्वास्थ |
भौतिक तन अध्यात्म मन, मिले मानसिक आथ ||

धन-दौलत या शक्ति हो, ख़ुशी मिले या दर्द |
भोगे मिलकर संग में, दोनों औरत-मर्द ||

इक दूजे का नित करें, आदर प्रति-सम्मान |
परिवारों के प्रति रहे, इज्जत एक समान ||

सुन्दर योग्य बलिष्ठ हो, अपने सब संतान |
कहें पाँचवा वचन सुन, बुद्धिमान इंसान ||

शान्ति-दीर्घ जीवन मिले, भूलें नहिं परमार्थ  |
सिद्ध सदा करते रहें, इक दूजे के स्वार्थ ||

रहे भरोसा परस्पर, समझदार-साहचर्य |
प्रेमपुजारी बन रहें, बने रहें आदर्य ||

सातों वचनों को करें, दोनों अंगीकार |
बारिश की लगती झड़ी, होय मूसलाधार ||

 वर्षा होती एक सी, उर्वर लेती सोख |
ऊसर सर सर दे बहा, रहती बंजर कोख |
रहती बंजर कोख, कर्म कुछ अच्छे कर ले |
बड़ा हृदय-विस्तार, गढ़न गढ़ करके भर ले |
कोमल-आर्द्र स्वभाव, उगें नव अंकुर हर्षा  |
पर ऊसर पर व्यर्थ, असर नहिं डाले वर्षा ||


तीन दिनों तक अनवरत, भारी वर्षा होय |
घुप्प अँधेरा छा रहा, धरती दिया भिगोय ||

किच-किच होता महल में, लगे ऊबने लोग |
भोजन की किल्लत हुई, खले लाग संयोग ||

सूर्य-देवता ने दिया,  दर्शन चौथे रोज |
मस्ती में सब झूमते, नव- आशा नव-ओज ||

वैवाहिक सन्दर्भ में, शुरू हुई फिर बात |
विधियाँ सब पूरी हुईं, विदा होय बारात ||

शांता ने सादर कहा, सुनिए प्रिय युवराज |
कन्याशाळा के भवन, का कैसा है काज ||

मुझे देखनी है प्रगति, ले चलिए अस्थान |
सृंगी-रूपा भी चले,  आत्रेयी मेहमान ||

आधा से ज्यादा बना, दो एकड़ फैलाव |
सृंगी बोले बटुक से, वह थैली ले आव ||

गीली थैली जब तलक, बटुक वहां पर लाय |
चार क्यारियाँ  स्वयं ही, सृंगी रहे बनाय ||

शांता ने रुद्राक्ष के, बदले भेजा धान |
औषधियेय प्रभाव से, डाली इसमें जान ||

मन्त्रों से ये सिद्ध हैं, उच्च-कोटि के धान |
अन्नपूर्णा की कृपा, सदा सर्वदा मान ||

चार क्यारियों में इन्हें, रोपें स्त्री चार ||
बारह-मासी ये उगें, जस जिसका व्यवहार ||

कन्याओं को नित मिले, मन-भर बढ़िया भात ||
द्रोही गर इनको छुवे, होय तुरत आघात ||

आत्रेयी रूपा सहित, शांता रमणी जाय |
अपनी अपनी क्यारियाँ, सुन्दर देत सजाय ||

बोलें भैया सोम्पद,  इक-हजार अनुदान |
नियमित मिलिहै कोष से, रुके नहीं अभियान ||

दीदी मैंने शर्त ये, पूरी कर दी आज |
दूजी अपनी शर्त का, खोलो अबतो राज |

जुटे बहुत से लोग हैं, रहे राज अब राज |
कभी बाद में मैं कहूँ, क्या तुमको एतराज ||

दीदी मैं तो आपका, अपना छोटा भाय |
हर इच्छा पूरी करूँ, गंगे सदा सहाय ||

सृंगी के आशीष से, बहुरे मंगल-मोद |
हरी भरी होने लगी, अंगदेश की गोद ||

रूपा के सानिध्य में, चंचल राजकुमार |
आँख बचा कर सभी की, करता आँखें चार ||

नयन से चाह भर, वाण मार मार कर
ह्रदय के आर पार, झूरे चला जात है |

नेह का बुलाय लेत, देह झकझोर देत
झंझट हो सेत-मेत, भाग भला जात है |

बेहद तकरार हो, खुदी खुद ही जाय खो
पग-पग पे कांटे बो, प्रेम गीत गात है |

मार-पीट करे खूब, प्रिय का धरत रूप
नयनों से करे चुप, ऐसे आजमात  है ||


शांता से छुपता नहीं, लेकिन यह व्यवहार |
रमणी को वह सौंपती, रूपा का सब भार ||


मिलन आस का वास हो, अंतर्मन में ख़ास  
सुध-बुध बिसरे तन-बदन, गुमते होश-हवाश ।  
गुमते होश-हवाश, पुलकती सारी देंही ।
तीर भरे उच्छ्वास,  ताकता परम सनेही ।
वर्षा हो न जाय, भिगो दे पाथ रास का  ।
अब न मुझको रोक, चली ले मिलन आस का ।।

मुश्किल में, दिल में मिले, बढ़े आत्म-विश्वास |
कंटक-पथ पर बढ़ चले, साथ मिले जो ख़ास |
साथ मिले जो ख़ास, रास हरदम आता है |
मात्र साथ एहसास, हमें रविकर भाता है |
जीवन इक संघर्ष, हमेशा विजय कामना |
बढ़ता मित्र सहर्ष, हाथ तू "सदा" थामना ||


बीस वर्ष का हो गया, लम्बा यहाँ प्रवास |
शांता आगे बढ़ चली, फिर से नए निवास ||

है कैसी यह बिडम्बना, नारी जैसे धान |
बार-बार बोई गई, बदल-बदल स्थान ||

धान कूट के फिर मिले, चावल निर्मल-श्वेत |
खेत खेत की यात्रा, हो जाती फिर खेत 

2 comments:

  1. है कैसी यह बिडम्बना, नारी जैसे धान |
    बार-बार बोई गई, बदल-बदल स्थान ||

    धान कूट के फिर मिले, चावल निर्मल-श्वेत |
    खेत खेत की यात्रा, हो जाती फिर खेत


    नारी जीवन का एक कडवा सच पर आवश्यक भी । कथा का प्रवाह बढिया है ।

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  2. सृन्गेश्वर में सज गई, शंकर सी बारात |
    परम बटुक लेकर चला, वर्षा की सौगात ||

    दोहों की गति और कथा का आवेग परस्पर एक अन्विति लिए हैं .

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