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28 September, 2012

कथा-सारांश : भगवती शांता परम-19

  सर्ग-4 
भाग -7
कौला का वियोग 
अंग-अवध छूटे सभी, सृंगी के संग सैर |
शांता साध्वी सी बनी, चाहे सबकी खैर ||


  कौला मुश्किल से सहे, हुई शांता गैर |
खट्टे-मिट्ठे दृश्य सब, गए आँख में तैर ||


  चौपाई 
रावण की दारुण अय्यारी | कौशल्या पर पड़ती भारी ||
कौशल्या का हरण कराये | पेटी में धर नदी बहाए ||

दशरथ संग जटायू धाये | पेटी सागर तट पर पाए ||
नारायण जप नारद आये | कौशल्या संग व्याह कराये ||

अवध नगर में खुशियाँ छाये | खर-दूषण योजना बनाये |
कौशल्या का गर्भ गिराया | पल-पल रावण रचता माया ||

सुग्गासुर आया इक पापी | गिद्धराज ने गर्दन नापी ||
नव-दुर्गा में खीर जिमाये |  नन्हीं-मुन्हीं कन्या आये ||

रानी फिर से गर्भ धारती | कौला विपदा विकट टारती ||
कौशल्या का छद्म वेश धर | सात मास मैके में जाकर ||

रावण के षड्यंत्र काटती | कौशल्या को ख़ुशी बांटती ||
शांता खुशियाँ लेकर आये | कौला को भी पास बुलाये ||

खुशियों पर ग्रहण लग जाता | शांता का इक पैर पिराता ||
नीमसार में सारे आते | दूर-दूर से वैद्य बुलाते ||

दशरथ कौशल्या सम गोती | गोतज से बीमारी होती ||
कन्या को अब गोद दीजिये | औषधि का नित लेप कीजिये ||

अंगदेश के राजा आते | शांता को ले गोद खिलाते ||
चम्पारानी खुब हरसाती | सूनी बगिया खिल-खिल जाती ||

दशरथ सुन्दर नाव सजाते | दास दासियाँ भी भिजवाते ||

कौला बच्ची को बहलाती | रस्ते में दालिम को पाती ||

दालिम सौजा का सौतेला | लड़े बाघ से निपट अकेला ||

 उससे भाई एक बचाए |  एक पूत को बाघ मिटाए ||


राजा देता ग्राम निकाला | किन्तु स्वयं ही उसे संभाला ||
शांता का रक्षक बन जाता | किस्मत पर अपनी मुस्काता ||


शांता अंगदेश आ जाती | कौला औषधि रोज लगाती ||
नामकरण में दशरथ आये | शांता पहला कदम बढाए ||

चम्पारानी गोद खिलाती | पुत्र सोम प्यारा सा पाती ||
कौला भी बन जाती माता | रूपा और बटुक का नाता ||

शांता से ज्यादा गहराता | बटुक पास में उसके जाता ||
गुरुकुल पढ़ने सोम जा रहे | नियमित घर आचार्य आ रहे || 

शांता को वे रोज पढ़ाते | रूपा और बटुक भी जाते ||
आठ साल में पूरी शिक्षा | शांता करती पास परीक्षा ||

वन विहार को शांता जाती | किन्तु महल में नहीं बताती ||
रूपा और बटुक भी जाए | काका अपनी जान लड़ाए ||

मिली ताड़का घेरी काका | काका बोला भाग तडाका ||
जान बची तो लाख उपाया | कई दिनों में काका आया ||

सृन्गेश्वर में सृंगी मिलते | दोनों के मन-हृदय पिघलते ||
शोध पे  लम्बी चर्चा होती | पुत्रकाम का सूत्र पिरोती ||

दशरथ यग्य कराते द्वारे | चार पुत्र पा जाते प्यारे ||
पड़े मुसीबत राम सहारा | भरत लखन शत्रुघ्न  दुलारा || 

शांता की जागी इक इच्छा | शुरू कराऊं नारी शिक्षा ||
कौशल्या शाला वह खोले | आचार्या बाला की हो ले ||

सूखा और अकाल अंग में | मरते जैसे लोग जंग में ||
पूरे साल सूखती धरती | शांता जन-जन के दुःख हरती ||

धरती के वस्त्र पीत, अम्बर की बढ़ी प्रीत 
भवरों की हुई जीत, फगुआ सुनाइये ।
जीव-जंतु हैं अघात, नए- नए हरे पात 
देख खगों की बरात, फूल सा लजाइये ।
चांदनी शीतल श्वेत, अग्नि भड़काय देत 
कृष्णा को करत भेंट, मधुमास आइये ।  
धीर जब अधीर हो, पीर ही तकदीर हो 
उनकी तसवीर को , दिल में बसाइए ।।


दोहे 
रो-गाकर करते विदा, छूटा फिर से देस |
किस्मत में उसके लिखा, बार बार परदेस ||

सभी हितैषी छूटते, रिश्ते बने नवीन |
परम बटुक ही है यहाँ, शिक्षा में लवलीन ||

पेटी इक श्रृंगार की,  संग में मंगल-हार |
इक माला रुद्राक्ष की, सृंगी  का उपहार ||

प्रियवर मैं समझी नहीं, भेजा जो रुद्राक्ष |
धारण करने से कहीं, काक होय ताम्राक्ष ||

समझे बिन कैसे धरी, फिर सन्यासिन रूप |
सुख सुविधा सारी तजी, त्याग भूप का कूप ||

निश्छल शांता की हँसी, लेती तब मन -मोह |
प्रतिदिन उनकी प्रीत है,  करती सद-आरोह ||

शाळा को अर्पित किया, सारा मंगल कोष |
मंगल-मंगल हो रहा, मंगलमय संतोष ||

 कन्या हर परिवेश में, पाए शिक्षा दान |
शिक्षित माता दे बना, सचमुच देश महान ||

आधी आबादी अगर, पाए न अधिकार |
सारे शासक-वर्ग को, है सौ-सौ धिक्कार ||

मैंने भेजा धान जब, हमको था यह भान |
रिस्य बूझ लेंगे तुरत,  देंय उचित अस्थान ||  

एक कदम आगे बढे, करवाया एहसास |
चार क्यारियों से किया, मात-पिता के पास ||

6 comments:

  1. बहुत सुन्दर, बधाई.

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  2. सच्चाई को शब्दों में बखूबी उतारा है आपने.सार्थक प्रस्तुति .आभार

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (30-09-2012) के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    सूचनार्थ!

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  4. बहुत सुंदर अलग ही अंदाज है वाह !

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  5. सुंदर कथा । प्रवाह बना हुआ है ।

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