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07 October, 2012

भगवान् राम की सहोदरा (बहन) : भगवती शांता परम-22

  सर्ग-5 : इति

भाग-1
चंपा-सोम
कई दिनों का सफ़र था, आये चंपा द्वार |
नाविक के विश्राम का, बटुक उठाये भार ||

राज महल शांता गई, माता ली लिपटाय |
मस्तक चूमी प्यार से, लेती रही बलाय ||

गई पिता के पास फिर, पिता रहे हरसाय |
स्वस्थ पिता को देखकर,फूली नहीं समाय ||

क्षण भर फिर विश्राम कर, गई सोम के कक्ष |
रूपा पर मिलती वहाँ, धक्-धक् करता वक्ष ||

गले सहेली मिल रही, पर आँखों में चोर |
सोम हमारे हैं कहाँ, अचरज होता  घोर ||

किन्तु सोम आये नहीं, किया प्रतीक्षा खूब |
शांता शाळा को चलीं, इन्तजार से ऊब ||

शाला में स्वागत हुआ, मन प्रफुल्लित होय |
अपनी कृति को देखकर, जैसे साधक सोय ||

आदरेया आत्रेयी, गले लगाती आय |
बाला कुछ संकोच वश, खुद को रहीं छुपाय ||

नव कन्याएं देखतीं, कौतूहल वश खूब |
सन्यासिन के वेश में, पूरी जाती ड़ूब ||

आनन्-फानन में जमे, सब उपवन में आय |
होती संध्या वंदना, रूपा कह समझाय ||

परिचय देवी का दिया, दिया ज्ञान का बार |
महाविकट दुर्भिक्ष से,  सबको  गई उबार || 

यह है अपनी शांता,  इनका  आशीर्वाद |
कन्या शाला चल पड़ी, गूंजा शुभ अनुनाद ||

पुत्तुल-पुष्पा थीं बनी, तीन वर्ष में मित्र |
मात-पिता के शोक में, स्थिति बड़ी विचित्र ||

ज़िंदा  है  माँ  जानता, इसका मिला सुबूत ।
आज पौत्र को पालती, पहले पाली पूत ।
पहले पाली पूत, हड्डियां घिसती जाएँ ।
करे काम निष्काम, जगत की सारी माएं ।
 किन्तु अनोखेलाल, कभी तो हो शर्मिन्दा ।
दे दे कुछ आराम मान कर मैया जिन्दा ।। 
कौला-सौजा राखती, कन्याओं का ध्यान |
पाक-कला सिखला रहीं, भाँति-भाँति पकवान ||

 
कामकाज  में  लीन  है,  सुध  अपनी विसराय |
उत्तम प्राकृत मनुज  की,  ईश्वर  सदा  सहाय ||

भले नागरिक वतन को, करते हैं खुशहाल |
बुरे   हमेशा   चाहते,  दंगे   क़त्ल    बवाल ||

दोनों बालाएं मिलीं, शांता ले लिपटाय |
आंसू पोंछे प्रेम से, रही शीश सहलाय ||

क्रीडा कक्षा का समय, बाला खेलें खेल |
घोड़ा आया सोम का, रूपा मिले अकेल ||

शांता को देखा वहां, आया झट से सोम |
छूता दीदी के चरण , दिल से कहता ॐ ||

चेहरे की गंभीरता,  देती इक सन्देश |
हलके में मत लीजिये, हैं ये चीज विशेष ||

दीदी अब घर को चलो, माता रही बुलाय |
कई लोग बैठे वहाँ,  काका  काकी आय ||

सौजा कौला मिल रहीं, रमणी है बेचैन |
दालिम काका भी मिले, आधी बीती रैन ||

नाव गाँव का कह रही, वो सारा वृतांत |
सौजा पूंछी बहुत कुछ, दालिम दीखे शांत ||
 
पर मन में हलचल मची, जन्मभूमि का प्यार |
 शाबाशी पाता बटुक, करे  ग्राम उद्धार ||

रमणी से मिलकर करे, शांता बातें गूढ़ |
रूपा तो हुशियार है, बना सके के मूढ़ ||

अगले दिन रूपा करे, बैठी साज सिंगार |
जाने को उद्दत दिखे, बाहर राजकुमार ||

शांता आकर बैठती, करे ठिठोली लाग |
सखी हमारी जा रही, कहाँ लगाने आग ||

सुन्दरता को न लगे, बहना कोई दाग |
अपनी रक्षा खुद करे, रखे नियंत्रित राग ||

रूपा को न सोहता, असमय यह उपदेश |
आया अंग नरेश का, इतने में सन्देश ||


अजब गजब अंदाज है, बात करें चुपचाप ।
इक जगह पर हों खड़े, खुद की सुन पदचाप ।
 खुद की सुन पदचाप, गजब दीवानापन है ।
बारिश में ले भीग, प्रेम रस का आसन है ।
फिर मिलने की बात, आज मत करना भाई ।
सही जाय नहिं सही, कहीं से यह रुसवाई ।।

रूपा को वो छोड़कर, गई पिता के पास |
चिंतित थोडा दीखते, चेहरा तनिक उदास ||

करें शिकायत सोम की, चंचलता इक दोष |
राज काज हित चाहिए, सदा सर्वदा होश ||

आयु मेरी बढ़ रही, शिथिल हो रहे अंग |
किन्तु सोम न सीखता, राज काज के ढंग ||

उडती-उडती इक खबर, करती है हैरान |
रूपा का सौन्दर्य ही, खड़े करे व्यवधान ||

हुआ राजमद सोम को, करना चाहे द्रोह |
रूपा मम पुत्री सरिस, रोकूँ कस अवरोह ||

तानाशाही सोम की, चलती अब तो खूब |
राजपुरुष जब निरंकुश, देश जाय तब डूब ||

मंत्री-परिषद् में अगर, रहें गुणी विद्वान |
राजा पर अंकुश रहे,  नहीं बने शैतान ||

पञ्च रतन का हो गठन, वही उठाये भार | 
करें सोम की वे मदद, करके उचित विचार ||

शांता कहती पिता से, दीजे उत्तर तात |
दे सकते क्या सोम को, रूपा का सौगात ||

करिए इनके व्याह फिर, चुनिए मंत्री पाँच |
महासचिव की आन पे, ना आवे पर आँच ||

सहमति में जैसे हिला, महाराज का शीश |
शांता की कम हो गयी, रूपा के प्रति रीस ||


उत्तर मिलता है कभी, कभी अलाय बलाय ।
प्रश्नों का अब क्या कहें, खड़े होंय मुंह बाय ।
खड़े होंय मुंह बाय, नहीं मन मोहन प्यारे ।
सब प्रश्नों पर मौन, चलें वैशाखी धारे ।
वैशाखी की धूम, लुत्फ़ लेता है रविकर ।
यूँ न प्रश्न उछाल, समय पर मिलते उत्तर ।।

तुरत बुलाया भूप ने,  आया जल्दी सोम |
दीदी पर पढ़ते नजर, रोमांचित से रोम ||

डुग्गी सारे देश में, एक बार बज जाय |
पांच रत्न चुनने हमें, कसके ठोक बजाय ||

राज कुंवर लेने लगे, जैसे लम्बी सांस |
दीदी की आई नहीं, अगली बातें रास ||

एक पाख में कर रहे, हम सब तेरा व्याह |
कह सकते हो है अगर, कोई अपनी चाह ||

पिता श्री क्यों कर रहे, इतनी जल्दी लग्न |
फिर रूपा के ख्याल में, हुआ अकेला मग्न ||

शुरू हुई तैयारियां, दालिम खुब हरसाय |
नेह निमंत्रण भेजते, सबको रहे बुलाय ||

रूपा तो घर में रहे, सोम उधर घबरात |
नींद गई चैना गया, रह रहकर अकुलात ||

टूटा दर्पण कर गया, अर्पण अपना स्नेह ।
बोझिल मन आँखे सजल, देखा कम्पित देह ।
देखा कम्पित देह, देखता रहता नियमित ।
होता हर दिन एक, दर्द नव जिस पर अंकित ।
कर पाता बर्दाश्त, नहीं वह काजल छूटा।
रूठा मन का चैन, तड़प के दर्पण टूटा ।। 

शादी के दो  दिन बचे, आये अवध-भुवाल |
कौशल्या के साथ में, राम लखन दोउ लाल ||

सृंगी तो आये नहीं, पहुंचे पर ऋषिराज |
पूर्ण कुशलता से हुआ, शादी का आगाज ||

जब हद से करने लगा, दर्द सोम का पार |
दीदी से जाकर मिला, विनती करे हजार ||
 
दीदी कहती सोम से, सुन ले मेरी बात |
शर्त दूसरी पूर कर, करे व्यर्थ संताप ||

मन की गाँठे खोल दे, पाए मधुरिम स्वाद ।
मन की गाँठों से सदा, बढ़ता दुःख अवसाद ।
बढ़ता दुःख अवसाद, गाँठ का पूरा कोई ।
चले गाँठ-कट चाल, पकड़ के माथा रोई ।
अपना मतलब गाँठ, भगा देते गौ-ठाँठे ।। 
रविकर लागे श्रेष्ठ, खोलना मन की गांठें ।
ठाँठे = दूध न देने वाली 

कौशल्या के पास फिर, गया सोम उस रात |
माता देखे  व्यग्रता, मन ही मन मुस्कात ||

जो मुश्किल में रख सके, मन में अपने धीर |
वही सोच सकता तनय, इक सच्ची तदवीर ||

कौला के जाकर छुओ, सादर दोनों पैर |
ध्यान रहे पर बात यह, जाओ मुकुट बगैर ||
 
उद्दत जैसे ही हुआ, झुका सामने सोम |
कौला पीछे हट गई, जैसे गिरता व्योम ||

अवधपुरी की रीत है, पूजुंगी कल पांव |
छूकर मेरे पैर को,  काहे पाप चढ़ाव ||

कन्याएं देवी सरिस, और जमाता मान |
पैर पूंज दे व्याह में, माता कन्यादान ||

हर्षित होकर के भगा, सीधे दीदी पास |
जैसे खोकर आ रहा, अपने होश-हवाश ||
नेह-निमंत्रण 
परसे  नैना  |
जन्म-जन्म के 
करषे  नैना | |  

प्रियतम को अब
तरसे    नैना  |
कितने  लम्बे-
अरसे   नैना ||

हौले  -  हौले 
बरसे    नैना |
जाते अब तो 
मर से  नैना  ||

अब आये क्यूँ   
घर  से  नैना |
जरा जोर से 
हरसे  नैना ||
दीदी के छूकर चरण, घुसता अपने कक्ष |
हर्षित होकर नाचता, जाना कन्या पक्ष ||

बहन-नारि-गुरु-सखी बन, करे पूर्ण सद्कर्म |
भाव समर्पण का सदा, बनता जीवन-धर्म ||
 
रानी सन्यासिन बने, दासी राजकुमारि |
जीती हर किरदार खुश, नारी विगत बिसारि ||
 
नारी सबल समर्थ है, कितने बदले रूप |
सामन्जस बैठा सहे, वर्षा साया धूप ||
शारीरिक शक्ति तनिक, नारी नर से क्षीन |
अंतर मन मजबूत पर, सहनशक्ति परवीन ।।

4 comments:

  1. आपकी इस उत्कृष्ट प्रस्तुति की चर्चा कल मंगलवार ९/१०/१२ को चर्चाकारा राजेश कुमारी द्वारा चर्चामंच पर की जायेगी

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  2. अति सुन्दर काव्य कथा .

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  3. शांता की सूझबूझ ने भाई का प्यार और राज्य दोनो बचा लिये । रविकर जी आपका अनेक आभार इस काव्यमय कथा को हम तक पहुंचाने के लिये ।

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