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06 October, 2012

हाय हाय यह दिवस, बनाया क्यूँ रे सन्डे -


Virendra Kumar Sharma 
जायदाद आधी मिले, कानूनन यह सत्य |
बेटी को दिलवा दिया, हजम करो यह कृत्य |
हजम करो यह कृत्य, भृत्य हैं गिरिजा सिब्बल |
चाटुकारिता काम, दिया उत्तर बेअक्कल |
माँ की दो संतान, बटेगा आधा आधा |
देखे हिन्दुस्तान, कहीं डाले ना बाधा ||


बहुओं पर इतनी कृपा, सौंप दिया सरकार ।
बेटी से क्या दुश्मनी, करते हो तकरार ।
करते हो तकरार, होय दामाद दुलारा ।
छोटे मोटे गिफ्ट, पाय दो-चार बिचारा ।
पीछे ही पड़ जाय, केजरी कितना काला ।
जाएगा ना निकल, देश का यहाँ दिवाला ।

संडे है आज तुझे कर तो रहा हूँ याद

सुशील  

सन्डे पर क्यूँ न लिखा, उसके कारण तीन |
हफ्ते भर की साड़िया, कुरता पैंट मशीन |
कुरता पैंट मशीन, इन्हें प्रेस करना पड़ता |
ख़ाक मिले अवकाश, किचेन का काम अखरता |
जाती वो बाजार, बैठ मैं देता अंडे |
हाय हाय यह दिवस, बनाया  क्यूँ रे सन्डे ||


वो औरत  

ई. प्रदीप कुमार साहनी

प्रश्न सही है मित्रवर, किन्तु पुरुष का दोष ।
इतना ज्यादा है नहीं, वह रहता खामोश ।
वह रहता खामोश, सास ननदें दें ताने  ।
महिलाओं का जोर, पुरुष भी उनकी माने । 
सीधा अत्याचार,  नारियां   शत्रु रही हैं ।
घोर अंध-विश्वास, नहीं यह प्रश्न सही है ।।  



जीवन के रंग

Maheshwari kaneri  

जीवन में भरती रहे, सदा अनोखे रंग ।
धन्य धन्य शुभ लेखनी, रहे हमेशा संग ।।


ई-कचड़ा से *ईति की, दिखे विश्व में भीति-

कूड़ा कचड़ा हर गली, चौराहों पर ढेर ।
घर में क्या कुछ कम पड़ा, ई-कचड़ा का फेर ।
ई-कचड़ा का फेर, फेर के नया खरीदें ।
निर्माता निपटाय, होंय ना कहीं उनीदें ।
धरती रही पुकार, प्रदूषण का यह पचड़ा ।
ई-खरदूषण रूप, दशानन कूड़ा-कचड़ा ।।

नारी शक्ति स्वरूप, सुधारो दुर्गा माता-

माता पर विश्वास ही, भारत माँ की शान ।
संस्कार *अक्षुण  रहें,  माँ लेती जब ठान ।
माँ लेती जब ठान, आन पर स्वाहा होना ।
पूनम का ही चाँद, ग्रहण से महिमा खोना ।
बेटी माँ का रूप, शील गुण उसपर जाता ।
नारी शक्ति स्वरूप, सुधारो दुर्गा माता ।।


ये है नारी शक्ति

Rajesh Kumari  


नमो नमो हे देवियों, सादर शीश नवाए ।
रविकर करता वंदना, कृपा करो हे माय ।
कृपा करो हे माय, धाय को भी हम पूजे ।
पूजे नदी पहाड़, पूजते इंगित दूजे ।
करे मातु कल्याण, समर्पण सहन-शक्ति है ।
पूँजू पावन रूप, हृदय में भरी भक्ति है ।।
 

10 comments:

  1. देखता हूँ दोनों रचनाएँ |
    नई पोस्ट:- वो औरत

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  2. आप तो बड़े और हिट रचनाकार बन गए हैं भई !

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  3. बेहद सरस और मनभावन।

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  4. रचनाकार ही हैं
    रचना को अपनी
    बतकही से करते
    चले जाते हैं हिट
    इनकी कही बस
    गजब हो जाती है
    रचना हमारी
    पिट जाती है ! :))))

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    Replies
    1. हा हा हा हा -
      क्या डाक्टर साहब-
      मैं तो अपना दर्द बाँट रहा था-
      छुट्टी के दिन घर में बड़ी दुर्दशा हो जाती है भाई-
      सादर ||

      Delete
    2. हा हा हा हा -
      क्या डाक्टर साहब-
      मैं तो अपना दर्द बाँट रहा था-
      छुट्टी के दिन घर में बड़ी दुर्दशा हो जाती है भाई-
      सादर ||


      Manu Tyagi has left a new comment on your post "संडे है आज तुझे कर तो रहा हूँ याद":

      आपकी रचना सोना उस पर रविकर जी की टिप्पणी सुहागा

      Delete
    3. हा हा हा
      देख लीजिये दोनो जगह की घडि़यां उल्टी चल रही है़ :))

      Delete
  5. कूड़ा कचड़ा हर गली, चौराहों पर ढेर ।
    घर में क्या कुछ कम पड़ा, ई-कचड़ा का फेर ।
    ई-कचड़ा का फेर, फेर के नया खरीदें ।
    निर्माता निपटाय, होंय ना कहीं उनीदें ।
    धरती रही पुकार, प्रदूषण का यह पचड़ा ।
    ई-खरदूषण रूप, दशानन कूड़ा-कचड़ा ।।

    इस सुन्दर रचना के लिए बधाई रविकर जी "कांग्रेसी कुतर्क "को चर्चा वार बनाने के लिए शुक्रिया .एक आलेख और आरहा है -अथ वागीश उवाच -ये कांग्रेसी हरकारे .

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  6. नर नारी दोनो रहे इक गाडी के चाक
    दोनो रखें संतुलन तो रस्ते कच्चे पक्के
    सभी पार हो जायें न आये कोई अडचन
    दोनो को चलना होगा मिलाये रख कर के मन ।

    पहली दोनो भी बहुत अच्छी लगीं कांग्रेसी चिंता ।

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  7. समस्या मूलक बेहतरीन रचना है "ई -कचरा " रेडिओ धर्मी कचरे की तरह यह भी पृथ्वी के लिए भस्मासुर बन गया है .भाई साहब प्रयोग कूड़ा-करकट है कूड़ा -कचड़ा नहीं .कचरा प्रचलित है हिंदी में ,कचड़ा नहीं .

    ram ram bhai
    मुखपृष्ठ

    सोमवार, 8 अक्तूबर 2012
    अथ वागीश उवाच :ये कांग्रेसी हरकारे

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