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10 October, 2012

भगवान् राम की सहोदरा (बहन) : भगवती शांता परम-23

सर्ग-5
अंतिम भाग 
पञ्च-रत्न 
शादी होती सोम से, शांता का आभार |
कौला दालिम खुश हुए, पाती रूपा प्यार ||


चाहत की कीमत मिली, अहा हाय हतभाग ।
इक चितवन देती चुका, तड़पूं अब दिन रात ।

तड़पूं अब दिन रात,  आँख पर आंसू छाये ।

दिल में यह तश्वीर, गजब हलचलें मचाये ।

देती कंटक बोझ, इसी से पाई राहत । 

कर्म कर गई सोझ, कोंच के नोचूं चाहत ।।


 
समाचार लेते रहे, शांता सृंगी व्यस्त  |
दुरानुभूती माध्यम, सूर्यदेव जब अस्त ||




परम बटुक को मिल रहा, राजवैद्य का नेह |
साधक आयुर्वेद का, करता अर्पित देह ||

 
कविता कर कर के करे, कवि कुल आत्मोत्थान ।
जैसे योगी तन्मयी, करे ईश का ध्यान ।
करे ईश का ध्यान, शान में पढ़े कसीदे ।
भावों में ले ढाल, ढाल से  सौ उम्मीदें  ।
रोके तेज कटार, व्यंग वाणों को रविकर ।
कायम रख ईमान, हमेशा कविता कर कर ।। 

कौशल्या उत्सुक बड़ी, कन्याशाला घूम |
मन को हर्षित कर गई, बालाओं की धूम ||


गोदी की इक बालिका, आकर करे कमाल |

संस्कारित शिक्षित करे, दो सौ ललना पाल ||


हर बाला इक वंश है, फूले-फले विशाल |

होवे देवी मालिनी,  हरी भरी हर डाल ||


शाळा को हर एक वर्ष, सौ पण का अनुदान |

कौशल्या कहकर चली, बिटिया बड़ी महान ||




राम-लखन के साथ में, शांता समय बिताय |
दूल्हा-दुल्हन की डगर, हक़ से छेके जाय ||

 
स्वर्णाभूषण त्याग दी,  आडम्बर सब त्याग |
भौतिकता से  है  नहीं,  दीदी  को  अनुराग ||

दीदी बोली कीजिये, शर्त दूसरी पूर |
शाळा हरदिन जायगी, रूपा सखी जरूर ||

जिम्मेदारी दीजिये, खींचों नहीं लकीर  |
नारी में शक्ती बड़ी, बदल सके तक़दीर ||

कन्याएं दो सौ वहां, अभिभावक दो एक |
शाला की चिंता हरे, रूपा मेरी नेक ||

बना व्यवस्था चल पड़ी, वह शाळा की ओर |
आत्रेयी को सौंपती, पञ्च-रत्न की डोर ||

आचार्या करने लगी, प्रश्न-पत्र तैयार |
कई चरण की जाँच से, होना होगा पार ||

नियत तिथि पर आ रहे, लेकर सब उम्मीद |
कन्याशाला में टिके,  पढ़ उद्धृत-ताकीद ||

पहला दिन आराम का, हुई ना कोई जाँच |
नगर भ्रमण कोई करे, कोई पुस्तक बाँच ||

कोई बैठा बाग़ में, कोई गंगा तीर |
खेल करे मैदान में, कई सयाने वीर ||

मिताहार कोई वहां, मिताचार से प्यार |
कुछ तो भोजन भट्ट हैं, और कई लठमार ||

सूची इक जारी हुई, बाइस वापस जाव |
बाकी इक्कावन बचे, काया जाँच कराव ||

तेरह इसमें छट गए, अड़तिस गंगा तीर |
डूबी पानी में उधर, ग्यारह की तकदीर ||

सत्ताईस की लेखनी, बाइस हों उत्तीर्ण |
पाँच जनों के हो रहे, ऐसे भाग-विदीर्ण ||

राज महल में मिल गया, सबको एकल कक्ष |
अपने अपने विषय में, थे ये पूरे दक्ष ||

बाइस पहले जो छटे, शाला के प्रति द्वेष |
शिक्षा के प्रति थी नहीं, उनमें रुची विशेष ||

राजकाज के काम दो, दिए एक से जाँय |
तीन दिनों में एक को, आओ सब निपटाय ||

प्रतिवेदन प्रस्तुत करो, लिखकर वापस आय |
एक परीक्षा बचेगी, तेरह  को  बिलगाय ||

गुप्तचरों की सूचना, वा प्रस्तुत आलेख |
महामंत्री ने चुने, प्रतिभागी नौ  देख ||

अगले दिन दरबार में, बैठे अंग नरेश |
नौ के नौ आयें वहां, धर दरबारी भेष ||

साहस संयम शिष्टता, अनुकम्पा औदार्य |
मितव्ययी निर्बोधता, न्याय-पूर्ण सद्कार्य ||

क्षमाशीलता सादगी, सहिष्णुता गंभीर |
सच्चाई प्रफुल्लता, निष्कपटी मन धीर ||

शुद्धि स्वस्ति मेधा रहे, हो चारित्रिक ऐक्य |
दानशीलता आस्तिक, अग्र-विचारी शैक्य ||

सर्वगुणी सब विधि भले, सब के सब उत्कृष्ट |
अंगदेश को गर्व है, गर्व करे यह सृष्ट ||

जाँच-परखकर कर रहे, सबको यहाँ नियुक्त |
एक वर्ष के बाद में, होंय चार जन मुक्त ||

तीन मास बीते यहाँ, आया फिर वैशाख |
शांता सृन्गेश्वर चली, मन में धीरज राख ||

कन्याओं से मिल लिया, पुष्पा-पुत्तुल पास |
रमणी को देकर चली, एक हिदायत ख़ास ||

 बटुक रमण फिर से चला, दीदी को ले साथ |
शिक्षा विधिवत फिर करे, जय हो भोले नाथ ||


आश्रम की रौनक बढ़ी, सास-ससुर खुश होंय |
सृंगी अपने शोध में, रहते  हरदम खोय ||

शांता सेवा में जुटी, परम्परा निर्वाह |
करे रसोईं चौकसी, भोजन की परवाह ||

शिष्य सभी भोजन करें, पावें नित मिष्ठान |
करें परिश्रम वर्ग में, नित-प्रति बाढ़े ज्ञान ||

 
वर्षा-ऋतु में पूजती, कोसी को धर ध्यान |
सृन्गेश्वर की कृपा से, उपजे बढ़िया धान ||

 
शांता की बदली इधर, पहले वाली चाल |
धीरे धीरे पग धरे, चलती बड़ा संभाल ||

 
खान-पान में हो रहा, थोडा सा बदलाव |
खट्टी चीजें भा रहीं,  बदल गए अब चाव ||

 
सासू माँ रखने लगीं, अपनी दृष्टी तेज |
प्रफुल्लित माता रखे,  चीजें सभी सहेज ||

 
पुत्री सुन्दर जन्मती, बाजे आश्रम थाल |
सेवा सुश्रुषा करे, पोसे बहुत संभाल ||

 
तीन वर्ष पूरे हुए, शिक्षा पूरी होय |
दीदी से मिलकर चले, बटुक अंग फिर रोय || 

 
फिर पूरे परिवार से, करके नेक सलाह |
माँ दादी को साथ ले, पकड़ें घर की राह || 

 
आश्रम इक सुन्दर बना, करते हैं उपचार |
साधुवाद है वैद्य जी, बहुत बहुत आभार ||

 
तीन वर्ष बीते इधर, मिला राज सन्देश |
वैद्यराज का रिक्त पद, तेरे लिए विशेष ||
 
क्षमा-प्रार्थना कर बचे, नहीं छोड़ते ग्राम |
आश्रम फिर चलता रहा, प्रेम सहित अविराम ||

रक्षाबंधन पर मिली, शांता घर पर आय |
भागिनेय दो गोद में, दीदी रही खेलाय ||

पुत्तुल के संग वो रखी, पाणिग्रहण प्रस्ताव |
मेरी सहमति है सदा, पुत्तुल की बतलाव ||

शांता लेकर बटुक को, चम्पानगरी जाय |
पुत्तुल के इनकार पर, रही उसे समझाय ||
 
नश्वर जीवन कर दिया, इस शाळा के नाम |
बस नारी उत्थान हित, करना मुझको काम ||

 
पुष्पा से एकांत में, मिलती शांता जाय |
वैद्य बटुक से व्याह हित, मांगी उसकी राय ||

शरमाई बाहर भगी, मिला मूल संकेत |
मंदिर में शादी हुई, घरवाला अनिकेत ||

रूपा से मिलकर हुई दीदी बड़ी प्रसन्न |
गोदी में इक खेलता, दूजा है आसन्न ||

पञ्च रत्न की सब कथा, पूछी फिर चितलाय |
डरकर नकली असुर से, भाग चार जन जाँय ||

पञ्च-रतन को एक दिन, दे अभिमंत्रित धान | 

खेती करने को कहा, देकर पञ्च-स्थान ||


बढ़िया उत्पादन हुआ, मन सा निर्मल भात |

खाने में स्वादिष्टतम, हुआ न कोई घात ||



राज काज मिल देखते, पंचरत्न सह सोम |

महासचिव का साथ है, कुछ भी ना प्रतिलोम ||



पिताश्री ने एक दिन, सबको लिया बुलाय |

पंचरत्न में चाहिए, स्वामिभक्त अधिकाय ||



चाटुकारिता से बचो, इंगित करिए भूल |

राजधर्म का है यही, सबसे बड़ा उसूल ||





औरन की फुल्ली लखैं , आपन  ढेंढर  नाय
ऐसे   मानुष   ढेर  हैं,   चलिए  सदा  बराय||

निर्बुद्धि की जिन्दगी, सुख-दुःख से अन्जान |
निर्बाधित जीवन जिए,  डाले  न व्यवधान  ||

बुद्धिवादी परिश्रमी,  पाले  घर  परिवार |
मूंछे  ऐठें  रुवाब से,  बैठे  पैर  पसार  ||

बुद्धिजीवी  का  बड़ा, रोचक  है  अन्दाज |
जिभ्या ही करती रहे, राज काज आवाज ||

बुद्धियोगी  हृदय  से,  लेकर  चले समाज |
करे भलाई जगत का, दुर्लभ हैं पर आज ||


लेकर सेवा भावना, देखो भाग विभाग |

पैदा करने में लगो, जनमन में अनुराग ||

मात-पिता से पूछ के, कुशल क्षेम हालात |
संतुष्टि पाती वहां, शांता वापस जात ||


कुशल व्यवस्थापक बनी, हुई भगवती माय |

पाली नौ - नौ  पुत्रियाँ,  आठो  पुत्र पढाय ||



एक से बढ़कर एक थे, संतति सब गुणवान |

शोध भाष्य करते रहे, पढ़ते वेद - पुरान ||


वैज्ञानिक वे श्रेष्ठ सब, मन्त्रों पर अधिकार |

अपने अपने ढंग से, सुखी करें संसार ||



सास-ससुर सब सौंप के, गए देव अस्थान |
राजकाज सब साध के, देकर के वरदान ||

वन खंडेश्वर को गए, बिबंडक महराज |
भिंड आश्रम को सजा, करे वहां प्रभु-काज ||

आठ पौत्रों से मिले, सब है बेद-प्रवीन |
बड़े भिंड के हो गए, आश्रम में आसीन ||
 
सौंपें सारे ज्ञान को, बाबा बड़े महान |
स्वर्ग-लोक जाकर बसे, छोड़ा यह अस्थान ||

भिन्डी ऋषि के रूप में, हुए विश्व विख्यात |
सात राज्य में जा बसे, पौत्र बचे जो सात ||
Trees in front of under ground Temple, Shringi Rishi

एक अवध में जा बसे, सरयू तट के पास |
बरुआ सागर आ गया, एक पुत्र को रास ||

विदिशा जाकर बस गए, सबसे छोटे पूत |
पुष्कर की शोभा बढ़ी, बाढ़ा वंश अकूत ||




आगे जाकर यह हुए, छत्तीस कुल सिंगार |
छ-न्याती भाई यहाँ, अतुलनीय विस्तार ||


बसे हिमालय तलहटी, चौरासी सद्ग्राम |

वंशज सृंगी के यहाँ, रहते हैं अविराम ||


सृंगी दक्षिण में गए, पर्वत बना निवास |
ज्ञान बाँट करते रहे, रही शांता पास ||

वंश-बेल बढती रही, तरह तरह के रूप |

कहीं मनीषी बन रमे, हुए कहीं के भूप ||



मंत्रो की शक्ती प्रबल, तंत्रों पर अधिकार |

कलियुग के प्रारब्ध तक, करे वंश व्यवहार ||



हुए परीक्षित जब भ्रमित, कलियुग का संत्रास |

स्वर्ण-मुकुट में जा घुसा, करता बुद्धी नाश  ||



सरिता तट पर एक दिन, लौटे कर आखेट |

लोमस ऋषि से हो गई, भूपति की जब भेंट ||



बैठ समाधि में रहे, राजा समझा धूर्त |

मरा सर्प डाला गले, जैसे शंकर मूर्त ||




वंशज देखें सृंग के, भर अँजुरी में नीर |

मन्त्रों से लिखते भये, सात दिनों की पीर ||



यही सर्प काटे तुम्हें, दिन गिनिये अब सात |

गिरे राजसी कर्म से, सहो मृत्यु आघात ||



मन्त्रों की इस शक्ति का, था राजा को भान |

लोमस के पैरों पड़ा, वह राजा नादान ||

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लेकिन भगवत-पाठ सुन, त्यागा राजा प्रान |

यह पावन चर्चित कथा, जाने सकल जहान ||



जय जय भगवती शांता परम

5 comments:

  1. ज़बर्जस्त आनुप्रासिक छटा बिखेरी है दोस्त .काव्य गरिमा कथा को मात दे रही है .

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  2. आपका कार्य और मेहनत प्रसंशनीय है रविकर जी !आभार आपका !

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  3. ओह, यहां तो पहली बार आया हूं।
    वाकई बहुत बढिया
    क्या बात

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    1. गोत्रीय शादी (दशरथ -कौशल्या ) के कारण उपेक्षित पात्र-
      शांता जिनकी शादी सृंगी ऋषि से हुई-
      आज के अधिकतर राजस्थान / हरियाणा के राजपूत / ब्राह्मण समाज इन्हें अपना पूर्वज मानता है-
      पूरी कथा -यहाँ पर है-
      संशोधन चल रहा है-
      http://chitrayepanne.blogspot.in/2012/10/blog-post.html

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  4. बहुत सुंदर जा रही है भगवती शांता की कथा ।

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