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18 October, 2012

दाहिज दुल्हन माँग रही, अपनी जननी ढिग माँग सुनावे-



 
दहेज – दुर्मिल सवैया
लछमी घर की अति नाज पली , मुख-माथ मनोहर तेज रहे
कल की कलिका ससुराल चली,नम नैनन से सब भेज रहे
मनुहार  करें  मनमोहन  से , सँवरी   सजती सुख-सेज रहे
बिटिया भगिनी भयभीत भई, पितु  भ्रात दहेज सहेज रहे ||
 
तन मानव का मति दानव की,धन-लोलुप निर्मम दुष्ट बड़े
उजले कपड़े नकली मुखड़े, मुँह फाड़ खड़े  अकड़े-अकड़े
बन हाट बजार बियाह गये, विधि नीति कुछेक गये पकड़े
कुछ युक्ति करो भय मुक्त करो,यह रीत बुरी जड़ से उखड़े ||
टिप्पणियाँ देखें  



  1. अरुण निगम के ब्लॉग पर, होता वाद विवाद ।
    विगत पोस्टों पर हुआ, पाठक मन क्या याद ?
    पाठक मन क्या याद, सशक्तिकरण नारी का ।
    बाल श्रमिक पर काव्य, करो अब दाहिज टीका ।
    रचे सवैया खूब, लीजिये हिस्सा जम के ।
    रहें तीन दिन डूब, पोस्ट पर अरुण निगम के ।।
    1. होता वाद विवाद पर ,आनंद है आता
      सब रखते अपनी बात,एक समा छा जाता,,,
    2. दाहिज पर टीका करें,हम तुम मिलजुल आज
      कसें कसौटी पर जरा , कितना सभ्य समाज
      कितना सभ्य समाज , बढ़े हैं कितना आगे
      कितने नींद में अबतक, कितने अबतक जागे
      बिटिया हो खुशहाल , न होवे पिता अपाहिज
      जीना करे हराम , दैत्य - दानव है दाहिज ||


      1. आये समय निकाल कर ,भ्राता सम्माननीय
        स्वागत मैं मन से करूँ ,आप हैं आदरणीय
        आप हैं आदरणीय , लाभ अनुभव का दीजे
        बेशकीमती सीख , यहाँ दे उपकृत कीजे
        हो दहेज का अंत , किस तरह दियो बताये
        किस विधि मिटे कलंक,सुखद दिन कैसे आये ||


  1. भाई रही संभालती, उसे डांट स्वीकार्य ।
    दो संतानों में बड़ी, सुता करे गृह कार्य ।
    सुता करे गृह कार्य, करे वर्षों वह सेवा ।
    दोयम दर्जा मिला, मिले कब सेवा मेवा ।
    जाती अब ससुरारि, बुजुर्गों बाँट कमाई ।
    करो चवन्नी खर्च, बचा पाए सब भाई ।।


    1. उसको बढते देख पिता का , दिल दुःखों से भर जाता.
      लाऊं कहाँ से दहेज सोचकर,पिताका मन है घबराता!
      सारी दुनिया कहती है आज, कि भेद नही बेटा- बेटी में,
      यही सोच कर लुटा दिया ,पिता ने जो धन था गठरी में!
    2. पाई - पाई जोड़ता , बाबुल टूटो जाय
      ये दहेज दानव भया,बिटिया-मन अकुलाय
      बिटिया-मन अकुलाय,बनी क्यों ऐसी रीतें
      लालच की बुनियाद ,खड़ी घर में ही भीतें
      माँ शंकित चुपचाप , परेशानी में भाई
      बाबुल टूटो जाय , जोड़ता पाई - पाई ||
    3. एक पक्ष यह भी --
      दाहिज दुल्हन माँग रही, अपनी जननी ढिग माँग सुनावे |
      माँग भरी जब जाय रही, वह माँग रही तब जो मन भावे |
      जो मइके कम मान मिले, भइया जियरा कसके तड़पावे |
      दाहिज का यह रोग बुरा, पहिले ज़र बाँट जमीन बटावे | |


  1. दाहिज यदि सच में बुरा, बदल दीजिये रीत |
    कन्या को छूछे विदा, कर दो मेरे मीत |
    कर दो मेरे मीत, मगर यह तो बतलाओ |
    जायदाद अधिकार, बीच में क्यूँकर लाओ |
    अजब गजब कानून, दोगला दिखे अपाहिज |
    या तो दोनों गलत, अन्यथा सच्चा दाहिज ||


    1. करना बात दहेज की,पहले लेना छोड
      तभी बात बन पायगी,देने से मुख मोड,,,,

    2. मानी जाये हार क्यों,क्यों तोड़ें हम आस
      कामयाब होंगे अगर , करते रहें प्रयास
      करते रहें प्रयास ,दिवस सुख के आयेंगे
      मन में है विश्वास,बुरे दिन मिट जायेंगे
      लेंगे नहीं दहेज , नहीं लेंगे कुर्बानी
      सब लेवें संकल्प,न होगी अब मनमानी ||



9 comments:

  1. लिंक लिख्खाड से भी टिप्पणियाँ गायब हो रहीं हैं यहाँ से भी ,ऐसे में टिपण्णी कार का हौसला टूटता है .

    अरुण कुमार निगम (हिंदी कवितायेँ)
    दहेज – दुर्मिल सवैया
    लछमी घर की अति नाज पली , मुख-माथ मनोहर तेज रहे

    कल की कलिका ससुराल चली,नम नैनन से सब भेज रहे

    मनुहार करें मनमोहन से , सँवरी सजती सुख-सेज रहे

    बिटिया भगिनी भयभीत भई, पितु भ्रात दहेज सहेज रहे ||


    तन मानव का मति दानव की,धन-लोलुप निर्मम दुष्ट बड़े

    उजले कपड़े नकली मुखड़े, मुँह फाड़ खड़े अकड़े-अकड़े

    बन हाट बजार बियाह गये, विधि नीति कुछेक गये पकड़े

    कुछ युक्ति करो भय मुक्त करो,यह रीत बुरी जड़ से उखड़े ||
    टिप्पणियाँ देखें

    रविकरOctober 16, 2012 10:44 AM
    अरुण निगम के ब्लॉग पर, होता वाद विवाद ।
    विगत पोस्टों पर हुआ, पाठक मन क्या याद ?
    पाठक मन क्या याद, सशक्तिकरण नारी का ।
    बाल श्रमिक पर काव्य, करो अब दाहिज टीका ।
    रचे सवैया खूब, लीजिये हिस्सा जम के ।
    रहें तीन दिन डूब, पोस्ट पर अरुण निगम के ।।

    अजी कौन न मर जाए इस "दिगज्ज चेम्प " कुंडली मार सवैया फैंक प्रतियोगिता पर सवैया और सोरठों पे

    पाई - पाई जोड़ता , बाबुल टूटो जाय
    ये दहेज दानव भया,बिटिया-मन अकुलाय
    बिटिया-मन अकुलाय,बनी क्यों ऐसी रीतें
    लालच की बुनियाद ,खड़ी घर में ही भीतें
    माँ शंकित चुपचाप , परेशानी में भाई
    बाबुल टूटो जाय , जोड़ता पाई - पाई ||

    रविकरOctober 17, 2012 7:47 PM
    एक पक्ष यह भी --
    दाहिज दुल्हन माँग रही, अपनी जननी ढिग माँग सुनावे |
    माँग भरी जब जाय रही, वह माँग रही तब जो मन भावे |
    जो मइके कम मान मिले, भइया जियरा कसके तड़पावे |
    दाहिज का यह रोग बुरा, पहिले ज़र बाँट जमीन बटावे | |
    सारंगी और तबले में जब ठन जाती है तब संगत में ऐसा ही होता है .

    ReplyDelete
  2. लिंक लिख्खाड से भी टिप्पणियाँ गायब हो रहीं हैं यहाँ से भी ,ऐसे में टिपण्णी कार का हौसला टूटता है .

    अरुण कुमार निगम (हिंदी कवितायेँ)
    दहेज – दुर्मिल सवैया
    लछमी घर की अति नाज पली , मुख-माथ मनोहर तेज रहे

    कल की कलिका ससुराल चली,नम नैनन से सब भेज रहे

    मनुहार करें मनमोहन से , सँवरी सजती सुख-सेज रहे

    बिटिया भगिनी भयभीत भई, पितु भ्रात दहेज सहेज रहे ||


    तन मानव का मति दानव की,धन-लोलुप निर्मम दुष्ट बड़े

    उजले कपड़े नकली मुखड़े, मुँह फाड़ खड़े अकड़े-अकड़े

    बन हाट बजार बियाह गये, विधि नीति कुछेक गये पकड़े

    कुछ युक्ति करो भय मुक्त करो,यह रीत बुरी जड़ से उखड़े ||
    टिप्पणियाँ देखें

    रविकरOctober 16, 2012 10:44 AM
    अरुण निगम के ब्लॉग पर, होता वाद विवाद ।
    विगत पोस्टों पर हुआ, पाठक मन क्या याद ?
    पाठक मन क्या याद, सशक्तिकरण नारी का ।
    बाल श्रमिक पर काव्य, करो अब दाहिज टीका ।
    रचे सवैया खूब, लीजिये हिस्सा जम के ।
    रहें तीन दिन डूब, पोस्ट पर अरुण निगम के ।।

    अजी कौन न मर जाए इस "दिगज्ज चेम्प " कुंडली मार सवैया फैंक प्रतियोगिता पर सवैया और सोरठों पे

    पाई - पाई जोड़ता , बाबुल टूटो जाय
    ये दहेज दानव भया,बिटिया-मन अकुलाय
    बिटिया-मन अकुलाय,बनी क्यों ऐसी रीतें
    लालच की बुनियाद ,खड़ी घर में ही भीतें
    माँ शंकित चुपचाप , परेशानी में भाई
    बाबुल टूटो जाय , जोड़ता पाई - पाई ||

    रविकरOctober 17, 2012 7:47 PM
    एक पक्ष यह भी --
    दाहिज दुल्हन माँग रही, अपनी जननी ढिग माँग सुनावे |
    माँग भरी जब जाय रही, वह माँग रही तब जो मन भावे |
    जो मइके कम मान मिले, भइया जियरा कसके तड़पावे |
    दाहिज का यह रोग बुरा, पहिले ज़र बाँट जमीन बटावे | |


    सारंगी और तबले में जब ठन जाती है तब संगत में ऐसा ही होता है .शानदार मुकाबला पक्ष विपक्ष का .दोनों पक्ष के दहेज़ के पोसें ये श्रीमान .......अपनी

    अपनी कह गए ,पूरी ढपली तान .

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  3. लिंक लिख्खाड से भी टिप्पणियाँ गायब हो रहीं हैं यहाँ से भी ,ऐसे में टिपण्णी कार का हौसला टूटता है .

    अरुण कुमार निगम (हिंदी कवितायेँ)
    दहेज – दुर्मिल सवैया
    लछमी घर की अति नाज पली , मुख-माथ मनोहर तेज रहे

    कल की कलिका ससुराल चली,नम नैनन से सब भेज रहे

    मनुहार करें मनमोहन से , सँवरी सजती सुख-सेज रहे

    बिटिया भगिनी भयभीत भई, पितु भ्रात दहेज सहेज रहे ||


    तन मानव का मति दानव की,धन-लोलुप निर्मम दुष्ट बड़े

    उजले कपड़े नकली मुखड़े, मुँह फाड़ खड़े अकड़े-अकड़े

    बन हाट बजार बियाह गये, विधि नीति कुछेक गये पकड़े

    कुछ युक्ति करो भय मुक्त करो,यह रीत बुरी जड़ से उखड़े ||
    टिप्पणियाँ देखें

    रविकरOctober 16, 2012 10:44 AM
    अरुण निगम के ब्लॉग पर, होता वाद विवाद ।
    विगत पोस्टों पर हुआ, पाठक मन क्या याद ?
    पाठक मन क्या याद, सशक्तिकरण नारी का ।
    बाल श्रमिक पर काव्य, करो अब दाहिज टीका ।
    रचे सवैया खूब, लीजिये हिस्सा जम के ।
    रहें तीन दिन डूब, पोस्ट पर अरुण निगम के ।।

    अजी कौन न मर जाए इस "दिगज्ज चेम्प " कुंडली मार सवैया फैंक प्रतियोगिता पर सवैया और सोरठों पे

    पाई - पाई जोड़ता , बाबुल टूटो जाय
    ये दहेज दानव भया,बिटिया-मन अकुलाय
    बिटिया-मन अकुलाय,बनी क्यों ऐसी रीतें
    लालच की बुनियाद ,खड़ी घर में ही भीतें
    माँ शंकित चुपचाप , परेशानी में भाई
    बाबुल टूटो जाय , जोड़ता पाई - पाई ||

    रविकरOctober 17, 2012 7:47 PM
    एक पक्ष यह भी --
    दाहिज दुल्हन माँग रही, अपनी जननी ढिग माँग सुनावे |
    माँग भरी जब जाय रही, वह माँग रही तब जो मन भावे |
    जो मइके कम मान मिले, भइया जियरा कसके तड़पावे |
    दाहिज का यह रोग बुरा, पहिले ज़र बाँट जमीन बटावे | |


    सारंगी और तबले में जब ठन जाती है तब संगत में ऐसा ही होता है .शानदार मुकाबला पक्ष विपक्ष का .दोनों पक्ष के दहेज़ के पोसें ये श्रीमान .......अपनी

    अपनी कह गए ,पूरी ढपली तान .

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  4. लिंक लिख्खाड से भी टिप्पणियाँ गायब हो रहीं हैं यहाँ से भी ,ऐसे में टिपण्णी कार का हौसला टूटता है .

    अरुण कुमार निगम (हिंदी कवितायेँ)
    दहेज – दुर्मिल सवैया
    लछमी घर की अति नाज पली , मुख-माथ मनोहर तेज रहे

    कल की कलिका ससुराल चली,नम नैनन से सब भेज रहे

    मनुहार करें मनमोहन से , सँवरी सजती सुख-सेज रहे

    बिटिया भगिनी भयभीत भई, पितु भ्रात दहेज सहेज रहे ||


    तन मानव का मति दानव की,धन-लोलुप निर्मम दुष्ट बड़े

    उजले कपड़े नकली मुखड़े, मुँह फाड़ खड़े अकड़े-अकड़े

    बन हाट बजार बियाह गये, विधि नीति कुछेक गये पकड़े

    कुछ युक्ति करो भय मुक्त करो,यह रीत बुरी जड़ से उखड़े ||
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    रविकरOctober 16, 2012 10:44 AM
    अरुण निगम के ब्लॉग पर, होता वाद विवाद ।
    विगत पोस्टों पर हुआ, पाठक मन क्या याद ?
    पाठक मन क्या याद, सशक्तिकरण नारी का ।
    बाल श्रमिक पर काव्य, करो अब दाहिज टीका ।
    रचे सवैया खूब, लीजिये हिस्सा जम के ।
    रहें तीन दिन डूब, पोस्ट पर अरुण निगम के ।।

    अजी कौन न मर जाए इस "दिगज्ज चेम्प " कुंडली मार सवैया फैंक प्रतियोगिता पर सवैया और सोरठों पे

    पाई - पाई जोड़ता , बाबुल टूटो जाय
    ये दहेज दानव भया,बिटिया-मन अकुलाय
    बिटिया-मन अकुलाय,बनी क्यों ऐसी रीतें
    लालच की बुनियाद ,खड़ी घर में ही भीतें
    माँ शंकित चुपचाप , परेशानी में भाई
    बाबुल टूटो जाय , जोड़ता पाई - पाई ||

    रविकरOctober 17, 2012 7:47 PM
    एक पक्ष यह भी --
    दाहिज दुल्हन माँग रही, अपनी जननी ढिग माँग सुनावे |
    माँग भरी जब जाय रही, वह माँग रही तब जो मन भावे |
    जो मइके कम मान मिले, भइया जियरा कसके तड़पावे |
    दाहिज का यह रोग बुरा, पहिले ज़र बाँट जमीन बटावे | |


    सारंगी और तबले में जब ठन जाती है तब संगत में ऐसा ही होता है .शानदार मुकाबला पक्ष विपक्ष का .दोनों पक्ष के दहेज़ के पोसें ये श्रीमान .......अपनी

    अपनी कह गए ,पूरी ढपली तान .

    लो जी कल्लो बात .हाथ की हाथ टिपण्णी गायब होमें हैं .(हो रहीं हैं आप क्या भैंसे चरा रहें हैं निकालों इन्हें खान्ग्रेसी स्पैम बोक्स से )

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  5. बहुत बढ़िया लगा आप तीनों की साहित्यिक प्रतिस्पर्धा, शुभकामनाएँ.

    ReplyDelete
  6. पसरे सौष्ठव चेतना, अधिक देह पर ध्यान ।

    अमृत से महरूम है, वह नन्हीं सी जान ।


    वह नन्हीं सी जान, मान ले मेरा कहना ।


    स्तन-पान संतान, करे जो तेरा बहना ।


    शिशू निरोगी होय, घटे कैंसर के खतरे ।


    बाढ़े शाश्वत प्रेम, नहीं बीमारी पसरे ।|स्तन पान एक फायदे अनेक .


    कबीरा खडा़ बाज़ार में


    वीरू भाई कवि -हृदय
    इटली का दामाद, बना भारत का जीजा ।
    पासपोर्ट पे फ्री, लगा इटली का वीजा ।

    चाँदी कूटे सिंह सियार सलमान डिसूजा
    भाई भतीजावाद, पार्टी पास्ता पीजा ।।

    होंठ भींच कर रखो जोर से तेरी बारी -
    नमक डाल जख्मों को उसने खु

    रचा मींजा ।।

    भाई साहब उलटी सीधी चंद पंक्तियाँ लिखकर भेजी ,रविकर जी ने ताल ठोक दी .आशु कवि हैं आप ब्लॉग जगत के .वीरुभाई .
    WEDNESDAY, 17 OCTOBER 2012

    साधारण सा ब्लॉग, मिले दो सौ हिट दिन में-रविकर

    http://dineshkidillagi.blogspot.com/

    ये हैं ब्लॉग जगत के आशु कवि रविकर (दिनकर जी ),ब्लॉग चक्रधर .बधाई इस अप्रतिम रचना के लिए .

    ReplyDelete
  7. पसरे सौष्ठव चेतना, अधिक देह पर ध्यान ।

    अमृत से महरूम है, वह नन्हीं सी जान ।


    वह नन्हीं सी जान, मान ले मेरा कहना ।


    स्तन-पान संतान, करे जो तेरा बहना ।


    शिशू निरोगी होय, घटे कैंसर के खतरे ।


    बाढ़े शाश्वत प्रेम, नहीं बीमारी पसरे ।|स्तन पान एक फायदे अनेक .


    कबीरा खडा़ बाज़ार में


    वीरू भाई कवि -हृदय
    इटली का दामाद, बना भारत का जीजा ।
    पासपोर्ट पे फ्री, लगा इटली का वीजा ।

    चाँदी कूटे सिंह सियार सलमान डिसूजा
    भाई भतीजावाद, पार्टी पास्ता पीजा ।।

    होंठ भींच कर रखो जोर से तेरी बारी -
    नमक डाल जख्मों को उसने खु

    रचा मींजा ।।

    भाई साहब उलटी सीधी चंद पंक्तियाँ लिखकर भेजी ,रविकर जी ने ताल ठोक दी .आशु कवि हैं आप ब्लॉग जगत के .वीरुभाई .
    WEDNESDAY, 17 OCTOBER 2012

    साधारण सा ब्लॉग, मिले दो सौ हिट दिन में-रविकर

    http://dineshkidillagi.blogspot.com/

    ये हैं ब्लॉग जगत के आशु कवि रविकर (दिनकर जी ),ब्लॉग चक्रधर .बधाई इस अप्रतिम रचना के लिए .

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  8. कहलाने एकत बसत अहि ,मयूर ,मृग ,बाघ जगत तपोवन सो कियो ,दीरघ दाघ ,निदाघ
    Virendra Kumar Sharma
    ram ram bhai

    गटक गए जब गडकरी, पावर रहा पवार |
    खुद खायी मुर्गी सकल, पर यारों का यार |
    पर यारों का यार, शरद है शीतल ठंडा |
    करवालो सब जांच, डालता नहीं अडंगा |
    रविकर सत्ता पक्ष, जांच करवाय विपक्षी |
    जनता लेगी जांच, बड़ी सत्ता नरभक्षी ||.........रविकर फैजाबादी .

    अब देखिये इसी प्रसंग पर अ -बौद्धिक चैनलियों की मति पर एक साहित्यिक तेवर एक कटाक्ष

    एक लघु कथा के रूप में ,वीगीश मेहता जी की कलम से -

    किसी बड़े ख्यात नेता के मुंह पर नाक बह रही थी (बोले तो म्यूकस ,रहट ,नेज़ल डिस्चार्ज ).विनोदप्रिय एक भाजपाई ने कहा -हाय !हाय !इसके मुंह पर नाक है .तो कुख्यात कांग्रेसी नेता को और कुछ न सूझा तो उसने कहा -हाय !हाय !इसके मुंह पर भी नाक है .

    इस बात को अ -बौद्धिक चैनलिया इस तरह ले उड़ा कि हाय !हाय !दोनों के मुंह पर नाक है .

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