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20 October, 2012

अवसर पाकर अंगुली पकड़ी "पहुंचा" पाते हो

लम्बे-लम्बे  इन्तजार से, खुब  तड़पाते  हो |
गोदी में सिर रखकर प्रियतम गीत सुनाते हो |

देर  से  आने  की  झूठी,  सब - गाथा गाते हो,
पलकें पोल खोलती  फिर भी बात बनाते हो |


एक-घरी रुक के खुद को  जो  व्यस्त बताते हो,
अनमयस्क से इधर उधर कर समय बिताते हो |

रह-रह कर के  विरह-अग्नि बरबस भड़काते हो, 
रह-रह करके पल-पल तन-मन आग लगाते हो |

शब्दों  के तुम  बड़े  खिलाड़ी  भाव  जमाते हो
अवसर पाकर अंगुली पकड़ी "पहुंचा" पाते हो |

प्यासी धरती पर रिमझिम सावन बरसाते हो  
मन-झुरमुट में हौले से  प्रिय फूल खिलाते हो |

3 comments:

  1. देर से आने की झूठी, सब - गाथा गाते हो,
    पलकें पोल खोलती फिर भी बात बनाते हो |


    बहुत सुंदर रचना
    क्या कहने

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  2. बात बनाने में माहिर लगते हो
    यूं ही हर पल मन को छलते हो :):)

    सच्चाई बयान कर दी है

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  3. बहुत खूब ..बधाई

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