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25 October, 2012

द्वितीय पुरस्कार - रविकर फ़ैज़ाबादी की कुण्डलिया

आदरणीय साथियो

हाल ही में संपन्न "चित्र से काव्य तक प्रतियोगिता" अंक १९ के निर्णय का समय आ चुका है. इस बार किसी भी प्रविष्टि को प्रथम पुरस्कार नहीं दिया जा रहा. निर्णय इस प्रकार है:

द्वितीय पुरस्कार - रविकर फ़ैज़ाबादी की कुण्डलिया
द्वितीय पुरस्कार रुपये ५०१/- व प्रमाण पत्र
प्रायोजक :-Ghrix Technologies (Pvt) Limited, Mohali
A leading software development Company


चश्में चौदह चक्षु चढ़, चटचेतक चमकार ।
रेगिस्तानी रेणुका, मरीचिका व्यवहार ।
मरीचिका व्यवहार, मरुत चढ़ चौदह तल्ले ।
मृग छल-छल जल देख, पड़े पर छल ही पल्ले ।
मरुद्वेग खा जाय, स्वत: हों अन्तिम रस्में ।
फँस जाए इन्सान, ढूँढ़ नहिं पाए चश्में ।।

*

तृतीय पुरस्कार - संदीप पटेल ’दीप’ के सोरठे
तृतीय पुरस्कार रुपये २५१/- व प्रमाण पत्र
प्रायोजक :-Rahul Computers, Patiala
A leading publishing House

सात सोरठे
मोह बिछाए जाल, मन मृग उलझे धीर तज
तृष्णा बनती काल, बढ़ बढ़ जाती पीर अज

मरुथल उड़ती धूल, पग पग में कांटे चुभे
नागफनी का फूल , थके पथिक के मन लुभे

असमंजस की बात, मरुथल में पानी बहे
माया खल की जात, आँखों को ठगती रहे

चाँद उतरता थाल, बालक को मोहित करे
ठगता माया जाल, स्वर्ण बने हिरना फिरे

वस्त्रों की ले खाल, निर्धन भी दिखता धनी
लालच बनता काल, जड़ से ज्ञानी की ठनी

प्यासे को है आस, हराभरा मरुथल बने
बुझे पथिक की प्यास, पानी से माटी सने

सत्ता का है लोभ, हाथ जोड़ दर पर खड़े
करे एक पल क्षोभ, दूजे पल अकड़े लड़े
*********************************************

विजेताओं को सम्पूर्ण ओबीओ परिवार की ओर से हार्दिक बधाई व साधुवाद. इन विजेताओं की रचनाएँ आगामी "चित्र से काव्य तक" प्रतियोगिता अंक-२० के लिए प्रतियोगिता से स्वतः ही बाहर होंगी | सादर


योगराज प्रभाकर
(प्रधान संपादक)
श्री रविकर (रविकर फैजाबादी)
(पहली प्रस्तुति)
दो सवैये

(
मत्तगयन्द)  


निर्जन निर्जल निर्मम निष्ठुर, नीरस नीरव निर्मद नैसा ।
निर्झर नीरज नीरद नीरत, नीमन नैमय नोहर कैसा ?
है मनुजाद मनोरथ दुष्ट, मरे मनई चिड़िया पशु भैंसा ।
तत्व भरे बहुमूल्य बड़े, "सिलिका " कण में पर बेहद पैसा ।।

निर्मद=हर्ष शून्य ; नैसा =खराब नीरत=नहीं है ; निर्झर-नीरज-नीरद = झरना-कमल-बादल ; नीमन=अच्छा ; नैमय=व्यापारी ; नोहर=दुर्लभ ; मनई=मानव ; मनुजाद=मनुष्य को खाने वाला राक्षस ; सिलिका = रेत, बालू , इलेक्ट्रानिक्स उपकरणों का आधारभूत तत्व

(
सुंदरी)
फुफकार रहे जब व्याल सखे, नुकसान नहीं कुछ भी कर पाए ।
मरुभूमि बनाय बिगाड़ रहा, नित रेतन टीलन से भरमाये ।
*निरघात लगे सह जाय शरीर, फँसे मृग मारिच जीवन खाए ।
पर नागफनी *टुकड़ा जब खाय, बचा जन जीवन जी हरसाए ।।

*मारक हवा के थपेड़े
(नागफनी का गूदा खाकर मरुस्थल में अपने प्राण बचाए जा सकते हैं -)

____________________________________________________
(२)
(द्वितीय प्रस्तुति)
कुंडलियाँ
चश्में चौदह चक्षु चढ़, चटचेतक चमकार ।
रेगिस्तानी रेणुका, मरीचिका व्यवहार ।
मरीचिका व्यवहार, मरुत चढ़ चौदह तल्ले ।
मृग छल-छल जल देख, पड़े पर छल ही पल्ले ।
मरुद्वेग खा जाय, स्वत: हों अन्तिम रस्में ।
फँस जाए इन्सान, ढूँढ़ नहिं पाए चश्में ।।

मरुकांतर में जिन्दगी, लगती बड़ी दुरूह ।
लेकिन जैविक विविधता, पलें अनगिनत जूह ।
पलें अनगिनत जूह, रूह रविकर की काँपे।
पादप-जंतु अनेक, परिस्थिति बढ़िया भाँपे ।
अनुकूलन में दक्ष, मिटा लेते कुल आँतर ।
उच्च-ताप दिन सहे, रात शीतल मरुकांतर ।।

रेतीले टीले टले, रहे बदलते ठौर।
मरुद्वेग भक्षण करे, यही दुष्ट सिरमौर ।
यही दुष्ट सिरमौर, तिगनिया नाच नचाए ।
बना जीव को कौर, अंश हर एक पचाए ।
ये ही मृग मारीच, जिन्दगी बच के जीले ।
देंगे गर्दन रेत, दुष्ट बैठे रेती ले ।

मृगनैनी नहिं सोहती, मृग-तृष्णा से क्षुब्ध ।
विषम-परिस्थित सम करें, भागें नहीं प्रबुद्ध ।
भागें नहीं प्रबुद्ध, शुद्ध अन्तर-मन कर ले ।
प्रगति होय अवरुद्ध, क्रुद्धता बुद्धी हर ले ।
रहिये नित चैतन्य, निगाहें रखिये पैनी ।
भ्रमित कहीं न होय, हमारी प्रिय मृग-नैनी ।।

चश्में=ऐनक / झरना
चटचेतक = इंद्रजाल
रेणुका=रेत कण / बालू
मरुद्वेग=वायु का वेग / एक दैत्य का नाम
मरुकांतर=रेतीला भू-भाग
जूह =एक जाति के अनेक जीवों का समूह
आँतर = अंतर
_______________________________________________
(तृतीय-प्रस्तुति )
सवैया
लूट रहे ज़र-ज़ोरु-ज़मीन भिड़ें खलु दुष्ट करें मुँह काला ।
भीषण रेगिसतान-मसान समान लगे मम देश विशाला ।
मारिष मानुष मोद मिले, मगदा मकु मोंहिं मिले मणि-माला ।
दुष्टन के दशद्वारन को दशबाहु दहाय मिटा दनु-हाला ।।
मारिष = सूत्रधार   मगदा = मार्ग दिखने वाला    मकु=कदाचित / चाहे
मणि-माला = रुद्राक्ष     दशद्वारन = दश द्वार / देह द्वार      दशबाहु = शिवशंकर
दोहे
हवा-हवाई रेत-रज, भामा भूमि विपन्न ।
रेतोधा वो हो नहीं, इत उपजै नहिं अन्न ।।
रेत=बालू / वीर्य
उड़ती गरम हवाइयाँ, चेहरे बने जमीन ।
शीश घुटाले धनहरा, कुल सुकून ले छीन ।।
(शीश घुटाले = सिर मुड़वाले / शीर्ष घुटाले      धनहरा = धन का हरण करने वाला )
भ्रष्टाचारी काइयाँ, अरावली चट्टान ।
रेत क्षरण नियमित करे, हारे हिन्दुस्तान ।।
कंचन-मृग मारीचिका, विस्मृत जीवन लक्ष्य ।
जोड़-तोड़ की कोशिशें, साधे भक्ष्याभक्ष्य ।|

24 comments:

  1. सगुन पाँच सौ एक,मुबारक भाई रविकर ,
    काम किया है नेक,बधाई बार-बार दें !

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    Replies
    1. बधाई चाहे एक हजार एक बार लें
      या हजार दो
      किंतु पहले पांच सौ एक रुपये मित्रों में बांट दें

      Delete
  2. प्रतियोगिता के सभी विजेताओं को ढेरों बधाइयाँ.......

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  3. रविकर जी आपको बहुत बहुत बधाई..


    हाल ही में संपन्न "चित्र से काव्य तक प्रतियोगिता" अंक १९ के निर्णय का समय आ चुका है. इस बार किसी भी प्रविष्टि को प्रथम पुरस्कार नहीं दिया जा रहा. निर्णय इस प्रकार है:


    हालाकि ऐसा निर्णय मैने पहली बार देखा है, अब आयोजकों को जानता नहीं हूं तो क्या कहूं..

    लेकिन मैने रविकर जी आपको प्रथम ही मान लिया है...

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  4. रहे पात्र सर्वदा प्रथम के,मिला जो भी संतोष किया
    बनी रहे बस कृपा शारदे,नहीं कामना और जिया!!

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  5. बहुत - बहुत बधाई सहित अनंत शुभकामनाएं

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  6. बधाई......
    कम से कम २५०/- का तो मीठा हो जाय....
    :-)

    सादर
    अनु

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  7. सादर अभिवादन!
    --
    बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (27-10-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

    ReplyDelete
  8. सादर अभिवादन!
    --
    बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (27-10-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

    ReplyDelete
  9. 25 OCTOBER, 2012
    द्वि फ़ैज़ाबादी की कुण्डलिया

    सबसे पहले मुबारक बाद .(कुंडलियां )तीय पुरस्कार - रविकर

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  10. 25 OCTOBER, 2012
    रविकर फ़ैज़ाबादी की कुण्डलिया

    सबसे पहले मुबारक बाद .(कुंडलियां )द्वितीय पुरस्कार - रविकर

    ReplyDelete
  11. 25 OCTOBER, 2012
    रविकर फ़ैज़ाबादी की कुण्डलिया

    सबसे पहले मुबारक बाद .(कुंडलियां )द्वितीय पुरस्कार - रविकर

    दोहे
    हवा-हवाई रेत-रज, भामा भूमि विपन्न ।
    रेतोधा वो हो नहीं, इत उपजै नहिं अन्न ।।
    रेत=बालू / वीर्य
    उड़ती गरम हवाइयाँ, चेहरे बने जमीन ।
    शीश घुटाले धनहरा, कुल सुकून ले छीन ।।
    (शीश घुटाले = सिर मुड़वाले / शीर्ष घुटाले धनहरा = धन का हरण करने वाला )
    भ्रष्टाचारी काइयाँ, अरावली चट्टान ।
    रेत क्षरण नियमित करे, हारे हिन्दुस्तान ।।
    कंचन-मृग मारीचिका, विस्मृत जीवन लक्ष्य ।
    जोड़-तोड़ की कोशिशें, साधे भक्ष्याभक्ष्य ।|

    ReplyDelete
  12. बहुत बढिया विवरण पर्यावरण से जुड़े मुद्दों को समेटे हुए .

    चश्में चौदह चक्षु चढ़, चटचेतक चमकार ।
    रेगिस्तानी रेणुका, मरीचिका व्यवहार ।
    मरीचिका व्यवहार, मरुत चढ़ चौदह तल्ले ।
    मृग छल-छल जल देख, पड़े पर छल ही पल्ले ।
    मरुद्वेग खा जाय, स्वत: हों अन्तिम रस्में ।
    फँस जाए इन्सान, ढूँढ़ नहिं पाए चश्में ।।

    मरुकांतर में जिन्दगी, लगती बड़ी दुरूह ।
    लेकिन जैविक विविधता, पलें अनगिनत जूह ।
    पलें अनगिनत जूह, रूह रविकर की काँपे।
    पादप-जंतु अनेक, परिस्थिति बढ़िया भाँपे ।
    अनुकूलन में दक्ष, मिटा लेते कुल आँतर ।
    उच्च-ताप दिन सहे, रात शीतल मरुकांतर ।।

    ReplyDelete
  13. आप किसी से कम नहीं हैं !

    ReplyDelete
  14. बहुत बहुत बधाई सर!


    सादर

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  15. बहुत बढ़िया विवरण पर्यावरण से जुड़े मुद्दों को समेटे हुए .

    चश्में चौदह चक्षु चढ़, चटचेतक चमकार ।
    रेगिस्तानी रेणुका, मरीचिका व्यवहार ।
    मरीचिका व्यवहार, मरुत चढ़ चौदह तल्ले ।
    मृग छल-छल जल देख, पड़े पर छल ही पल्ले ।
    मरुद्वेग खा जाय, स्वत: हों अन्तिम रस्में ।
    फँस जाए इन्सान, ढूँढ़ नहिं पाए चश्में ।।

    मरुकांतर में जिन्दगी, लगती बड़ी दुरूह ।
    लेकिन जैविक विविधता, पलें अनगिनत जूह ।
    पलें अनगिनत जूह, रूह रविकर की काँपे।
    पादप-जंतु अनेक, परिस्थिति बढ़िया भाँपे ।
    अनुकूलन में दक्ष, मिटा लेते कुल आँतर ।
    उच्च-ताप दिन सहे, रात शीतल मरुकांतर ।।



    रविकर फ़ैज़ाबादी की कुण्डलिया

    सबसे पहले मुबारक बाद .(कुंडलियां )द्वितीय पुरस्कार - रविकर

    दोहे
    हवा-हवाई रेत-रज, भामा भूमि विपन्न ।
    रेतोधा वो हो नहीं, इत उपजै नहिं अन्न ।।
    रेत=बालू / वीर्य
    उड़ती गरम हवाइयाँ, चेहरे बने जमीन ।
    शीश घुटाले धनहरा, कुल सुकून ले छीन ।।
    (शीश घुटाले = सिर मुड़वाले / शीर्ष घुटाले धनहरा = धन का हरण करने वाला )
    भ्रष्टाचारी काइयाँ, अरावली चट्टान ।
    रेत क्षरण नियमित करे, हारे हिन्दुस्तान ।।
    कंचन-मृग मारीचिका, विस्मृत जीवन लक्ष्य ।
    जोड़-तोड़ की कोशिशें, साधे भक्ष्याभक्ष्य ।|

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  16. बहुत बहुत बधाई !

    ReplyDelete
  17. रविकर जी आपको बहुत बहुत बधाई

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