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16 November, 2012

रविकर के दोहे -


बाबा बापू चल बसे, बसे अनोखे पूत ।

संस्कार की छत ढहे, अजब गजब करतूत ।। 


 
 चिंगारी भड़का गई, जली बुझी दिल-आग।
 जमी समय की राख है, मत कुरेद कर भाग ।।
 
जल-धारा अनुकूल पा, चले जिंदगी नाव ।

धूप-छाँव लू कँपकपी, मिलते गए पड़ाव ।।


दिल से निकली बात जब, जाए ज्यादा दूर ।

मचे तहलका जगत में, नव-गुल खिले जरूर  ।

  
महलों में बिगड़ें बड़े, बच्चों की क्या बात ।

नया घोसला ले बना, मार महल को लात ।


बच्ची बहिनी बन बुआ, मौसी बीबी माय ।

नए नए नित नाम दे, नित सूरत बदलाय ।। 

पटाक्षेप होने चला, सुख दुःख का यह खेल ।
करवट देखो ऊंट की, मत कर ठेलमठेल ।।

 चूहे पहले भागते, डूबे अगर जहाज ।
गिरती देख दिवार को, ईंट करे नहिं लाज ।

6 comments:

  1. चर्चा मंच में बिठाने के लिए आभार ,नेहा ,प्यार ,

    रूप तेरा साकार ,लेता एक आकार ,

    कुंडली तेरी जय जय .

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  2. चूहे पहले भागते, डूबे अगर जहाज ।
    गिरती देख दिवार को, ईंट करे नहिं लाज ।
    Posted by रविकर at 23:12

    बहुत खूब कहा एक सत्य को दोहे के मार्फ़त .

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  3. चिंगारी भड़का गई, जली बुझी दिल-आग।
    जमी समय की राख है, मत कुरेद कर भाग ।।

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  4. बहुत खूब !बहुत खूब !बहुत खूब !

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  5. जल-धारा अनुकूल पा, चले जिंदगी नाव ।
    धूप-छाँव लू कँपकपी, मिलते गए पड़ाव ।।........
    ये जीवन है.....बेहतरीन प्रस्तुति.

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  6. बेहतरीन अभिव्यक्ति | बहुत खूब |

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