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09 November, 2012

लाल अशर्फी होती काली, कौड़ी कौड़ी हुई दिवाली -


Deepvali1126

बीत गया भीगा चौमासा । उर्वर धरती बढती आशा ।
त्योहारों का मौसम आये।  सेठ अशर्फी लाल भुलाए ।
 
 
विघ्नविनाशक गणपति देवा। लडुवन का कर रहे कलेवा
माँ दुर्गे नवरात्रि आये । धूम धाम से देश मनाये ।
 
 
विजया बीती करवा आया । पत्नी भूखी गिफ्ट थमाया ।
जमा जुआड़ी चौसर ताशा । फेंके पाशा बदली भाषा ।।



एकादशी रमा की आई ।  वीणा बाग़-द्वादशी गाई ।
धनतेरस को धातु खरीदें । नई नई जागी उम्मीदें ।

धन्वन्तरि की जय जय बोले ।  तन मन बुद्धि निरोगी होले ।
काली पूजा बंगाली की । लक्ष्मी पूजा दीवाली की ।।



झालर दीपक बल्ब लगाते । फोड़ें बम फुलझड़ी चलाते ।
खाते कुल पकवान खिलाते । एक साथ सब मिलें मनाते ।

लाल अशर्फी फड़ पर बैठी | रहती लेकिन किस्मत ऐंठी ।
 फिर आया जमघंट बीतता | बर्बादी ही जुआ जीतता ।।



लाल अशर्फी होती काली | कौड़ी कौड़ी हुई दिवाली ।
 भ्रात द्वितीया बहना करती | सकल बलाएँ पीड़ा हरती ।

चित्रगुप्त की पूजा देखा । प्रस्तुत हो घाटे का लेखा ।
सूर्य देवता की अब बारी।  छठ पूजा की हो तैयारी ।।

 

7 comments:


  1. धन्वन्तरि की जय जय बोले । तन मन बुद्धि निरोगी होले ।
    काली पूजा बंगाली की । लक्ष्मी पूजा दीवाली की ।।

    शुभ दिवाली पर बेहद शुभ पोस्ट संस्कृति संसिक्त लेकर आये ,रविकर आये .

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  2. बहुत सुंदर
    दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं

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  3. वाह पूरी दीपावली सजा दी आपने । अनेक शुभ कामनाएं ।

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  4. भारतीय संस्कृति इतनी समृद्ध है कि आप यदि हर त्योहार के नाम का एक-एक मनका भी माला में पिरो लें तो भी कम-से-कम दो-तीन मालाएँ जाप के लिए हमारे आपके हाथ में होंगीं।

    रविकर जी, मैंने आपकी और अरुण जी जैसी आशु कविताई की वर्तमान में कभी कल्पना भी नहीं की। आप और अरुण जी वर्तमान साहित्य जगत के सिरमौर हैं। कभी मन में एक कसक थी कि वर्तमान में सूर-तुलसी-केशव जैसे कवि क्यों नहीं होते। मन में ये सुकून है कि अब उसकी भरपायी हो गयी है। अरुण निगम जी और आप जिस निष्ठा से साहित्य की सेवा में लगे हैं वह अद्भुत है, सराहनीय है, वन्दनीय है।


    आप जैसे आदरणीय कविश्रेष्ठ बंधुओं से आशीर्वाद मिले तो जबरन कोशिश से बने कवियों पर माँ शारदा की कृपा होवे।


    दीपावली की अनंत शुभकामनाओं के साथ चरण-स्पर्श।

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    1. हैं तुलसी शशि सूर रवि, केशव खुद खद्योत ।

      रविकर थोथे चने सम, पौध उगी बिन जोत ।

      पौध उगी बिन जोत, घना लगता है बजने ।

      अजब झाड़-झंखाड़, भाव बे-वजह उपजने ।

      उर्वर पद-रज पाय, खाय मन रविकर हुलसी ।

      एक अंश बन जाय, शंखपति जब हैं तुलसी ।।

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  5. बहुत सुंदर
    दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं....

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  6. दिवाली मुबारक भाई साहब ,ब्लोगिंग मुबारक भाई साहब .

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