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27 January, 2013

खुले तीसरा नेत्र, सहम जाता है नन्दी-

नन्दी मुण्डी दे हिला, चारा से इनकार ।
कोई चारा ना बचे, शिव कर भ्रष्टाचार ।

शिव कर भ्रष्टाचार, जमा कुल माल खर-चने ।
बढ़िया आशिर्वाद, चढ़ावा चढ़ा अरचने ।

किन्तु इधर प्रीतीश, लिवाले रति सी बन्दी ।
खुले तीसरा नेत्र, सहम जाता है नन्दी ।।

7 comments:

  1. किन्तु इधर प्रीतीश, लिवाले रति सी बन्दी ।
    खुले तीसरा नेत्र, सहम जाता है नन्दी ।।
    सार्थक अभिव्यक्ति !

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  2. प्रभावशाली ,
    जारी रहें।

    शुभकामना !!!

    आर्यावर्त
    आर्यावर्त में समाचार और आलेख प्रकाशन के लिए सीधे संपादक को editor.aaryaavart@gmail.com पर मेल करें।

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  3. बढ़िया प्रस्तुति भाई साहब .

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  4. वाह!
    आपकी यह प्रविष्टि को आज दिनांक 28-01-2013 को चर्चामंच-1138 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

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  5. बहुत ही सार्थक अभिव्यक्ति ,आपका धन्यबाद।

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  6. बहुत बढ़िया साब | मज़ा आ गया अंतिम दोहों में |

    Tamasha-E-Zindagi
    Tamashaezindagi FB Page

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