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09 January, 2013

मोहन बाबू मर्द, कभी काटी ना चुटकी-



indian commuter train
 दो दो पैसे में बटा, किम्मी किम्मी दर्द
तुम क्या जानो कीमतें, मोहन बाबू मर्द ।

मोहन बाबू मर्द, कभी काटी ना चुटकी
देह आज है जर्द, आत्मा अटकी भटकी ।

समय सुरक्षित रेल, बढ़ें सुविधाएं कैसे ?
रहे संपदा लूट, लूट अब दो दो पैसे ।।

पैमाना अब सब्र का, कांग्रेस लबरेज ।
ठोकर मारेंगे भड़क, शान्ति-वार्ता मेज ।

शान्ति-वार्ता मेज, दामिनी को दफनाया ।
नक्सल के इक्कीस, पाक की हरकत जाया ।

आज पड़ी जो मार, मरे अब्दुल दीवाना ।
बेगाने का व्याह, छलक जाता पैमाना ।।

बाह्य-व्यवस्था फेल, नहीं अन्दर भी बाकी

पाकी दो सैनिक हते, इत नक्सल इक्कीस ।
रविकर इन पर रीस है, उन पर दारुण रीस ।
उन पर दारुण रीस, देह क्षत-विक्षत कर दी ।
सो के सत्ताधीश, गुजारे घर में सर्दी ।
बाह्य-व्यवस्था फेल, नहीं अन्दर भी बाकी ।
सीमोलंघन खेल, बाज नहिं आते पाकी ।। 

1 comment:

  1. हमें तो इस बात पर भी शक है की यह मोहन बाबू मर्द है !!

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