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06 February, 2013

दो दिन बच्चन संग, चलो गुजरात गुजारें -


जा रे रोले दुष्ट-मन, जार जार दो बार ।
जरा-मरा कोई नहीं, दिखे जीव *इकतार ।

दिखे जीव *इकतार, पले हैं भले "गो-धरा" ।
जब उन्नत व्यापार, द्वंद-हथियार भोथरा ।

अव्वल है यह प्रांत, सही नीतियाँ सँवारे
दो दिन बच्चन संग, चलो गुजरात गुजारे ।।
*समान 

4 comments:

  1. सादर प्रणाम ,यथार्थ से परिचय करती सुंदर रचना के लिए साधुवाद

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  2. वाह सामयिक सुंदर कुंडली ।

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