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18 February, 2013

राजनैतिक कुण्डलिया : रहे "मुखर-जी" सदा ही, नहीं रहे मन मौन





रहे "मुखर-जी" सदा ही, नहीं रहे मन मौन ।
आतंकी फांसी चढ़े, होय दुष्टता *दौन ।

होय दुष्टता *दौन, फटाफट करे फैसले ।
तभी सकेंगे रोक, सदन पर होते हमले ।

कायरता की देन, दिखा सत्ता खुदगर्जी ।
बना "सॉफ्ट-स्टेट",  सॉफ्ट ना रहे "मुखर्जी"।।
*दमन

बेटा -लेटा सुन रहा, जी टी वी पर न्यूज |
नैतिक शिक्षा से हुआ, दिल-दिमाग कुल फ्यूज |
 
दिल-दिमाग कुल फ्यूज, दाँत हाथी के देखे |
लम्बी लम्बी बात, किताबी इनके लेखे |

चॉपर टू-जी तोप, कोयला सभी समेटा |
यह चर्चा तकरार, समझ नहिं पाए बेटा ||

थोथा थापा द्वार पर, करता बन्टाधार |
पंजे के इस छाप से, कैसा अब उद्धार |
 
कैसा अब उद्धार, भांजती *थापी सत्ता |
थोक-पीट सामंत, उतारे कपडा-लत्ता |
 
रहे कब्र यह खोद, निभा अब ना बहिनापा |
दर दरवाजा छोड़, लगा ना थोथा थापा ||


9 comments:

  1. बहुत सुन्दर शब्द दिए है आपने अपने मन के
    मेरी नई रचना
    एक स्वतंत्र स्त्री बनने मैं इतनी देर क्यूँ

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  2. क्या खूब कहा आपने वहा वहा बहुत सुंदर !! क्या शब्द दिए है आपकी उम्दा प्रस्तुती
    मेरी नई रचना
    प्रेमविरह
    एक स्वतंत्र स्त्री बनने मैं इतनी देर क्यूँ

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  3. बहुत ही सुन्दर!

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  4. bahut khoob
    please visit my blog kaynatanusha.blogspot.in

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  5. सही कहा है, आजकल कपडे लत्ते ही उतर रहे हैं.

    रामराम.

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  6. उम्दा प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...

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