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15 March, 2013

अलबेला यह देश, गधों को मिला *तबेला

(1)
बेला पापड ढेर ठो , माफ़ी हुई क़ुबूल । 
पा बेला अनुकूल फिर, लगा झोंकने धूल । 

लगा झोंकने धूल, भूलता पाप पुराना । 
भूला धर्म उसूल, शुरू फिर शूल उगाना । 

शान्ति व्यवस्था भंग, देख खच्चर का मेला। 
अलबेला यह देश, गधों को मिला *तबेला । 
*घुडसाल 

(2)
माया के जंजाल की, बड़ी मुलायम काट |
लेकिन वह अखिलेश भी, करता बन्दरबांट |

करता बन्दरबांट, धकेले भर भर कुप्पा |
जहाँ खड़ी हो खाट, बैठ जाता वह चुप्पा |

यमुना कुंडा ख़ास, कुम्भ भरदम भटकाया |
खोवे होश-हवास,  खड़ी मुस्काये माया-

9 comments:

  1. शान्ति व्यवस्था भंग, देख खच्चर का मेला।
    अलबेला यह देश, गधों को मिला *तबेला ।

    :) :)

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  2. बहुत ही सही फरमाया गुरुदेव अखिलेश जी ऐसे ही कर रहें है.

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  3. माया के जंजाल की, बड़ी मुलायम काट |
    लेकिन वह अखिलेश भी, करता बन्दरबांट |

    करता बन्दरबांट, धकेले भर भर कुप्पा |
    जहाँ खड़ी हो खाट, बैठ जाता वह चुप्पा |

    यमुना कुंडा ख़ास, कुम्भ भरदम भटकाया |
    खोवे होश-हवास, खड़ी मुस्काये माया-

    क्या बात है ,बहुत खूब सर जी .

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  4. इस देश में बंदरबांट ही तो चल रही है, बहुत सटीक कटाक्ष किया आपने.

    रामराम.

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  5. माया के जंजाल की, बड़ी मुलायम काट |
    लेकिन वह अखिलेश भी, करता बन्दरबांट |

    करता बन्दरबांट, धकेले भर भर कुप्पा |
    जहाँ खड़ी हो खाट, बैठ जाता वह चुप्पा |

    यमुना कुंडा ख़ास, कुम्भ भरदम भटकाया |
    खोवे होश-हवास, खड़ी मुस्काये माया-
    बहुत खूब सर जी .

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  6. आपकी यह रचना दिनांक 21.06.2013 को http://blogprasaran.blogspot.in/
    पर लिंक की गयी है। कृपया इसे देखें और अपने सुझाव दें।

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