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04 April, 2013

पुरुषों के मानिंद, *घूरती बेटी-बहु रे -

बहुरे घूरे के दिना, गिना साल दर साल । 
अब घूरे जाएँ पुरुष, बनकर महिला माल । 

बनकर महिला माल, सँवारे घंटा सारी । 
किन्तु घटा उत्साह, करे घंटा तैयारी । 

तज सोलह श्रृंगार, वस्त्र साधारण पहिरे । 
पुरुषों के मानिंद, *घूरती बेटी-बहु रे ॥ 
*घूमती 

8 comments:

  1. वाह भाई वाह वो देखो तौलती काया ...नजरों से

    इशारों से आदमी का वजन बतलाती बाला महान

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  2. बढ़िया!!!!!


    सादर
    अनु

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  3. कल दिनांक 07/04/2013 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  4. बहुरे...बहु रे ...सुंदर प्रस्तुति

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