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04 June, 2013

हे आतंकी साब, जता इन मौतों पर हक़-

नाहक चिंता कर रहे, गाजर-मूली तंत्र ।
जगह जगह यमदूत हैं, मारें मारक मन्त्र ।  

मारें मारक मन्त्र, महामारी मंहगाई ।
नित-प्रति एक्सीडेंट, मार मौसम की खाई ।

हे आतंकी साब, जता इन मौतों पर हक़ ।
मरते कई हजार, मारता फिर क्यूँ नाहक ।।

4 comments:

  1. बढियां रचना और अच्छी प्रस्तुति. आम आदमी की मुसीबतों और आतंक को जोड़ने का अच्छा प्रयास.

    -अभिजित (Reflections)

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  2. simply superb. Nice one
    regards Madan

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  3. बात तो सही है
    बहुत बढिया रचना

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  4. आतंकी को सलाह अच्छी है । काश सुन ही ले ।

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