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28 July, 2013

जीवन से कुल हास्य रस, जग ले जाए छीन-

अखरे नखरे खुरखुरे, जब संवेदनहीन  |
जीवन से कुल हास्य रस, जग ले जाए छीन |

जग ले जाए छीन, क्षीण जीवन की आशा |
बिना हास्य रोमांस, गले झट मनुज-बताशा |

खे तनाव बिन नाव, किनारा निश्चय लख रे |
लाँघे विषम बहाव, ज्वार-भांटा नहिं अखरे ||

8 comments:

  1. हंसी खुशी ही जीवन है । बढिया प्रस्तुति ।

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  2. खे तनाव बिन नाव, किनारा निश्चय लख रे |
    लाँघे विषम बहाव, ज्वार-भांटा नहिं अखरे ||
    sahi kaha hai bahut sundar ...

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  3. खे तनाव बिन नाव, किनारा निश्चय लख रे |
    लाँघे विषम बहाव, ज्वार-भांटा नहिं अखरे ||

    तनावरहित होकर किसी भी समस्या को सुलझाया जा सकता है
    बहुत खूब , सादर !

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  4. क्या बात क्या बात है रविकर भाई की।

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  5. आपको यह बताते हुए हर्ष हो रहा है के आपकी यह विशेष रचना को आदर प्रदान करने हेतु हमने इसे आज के ब्लॉग बुलेटिन - हंसी के फव्वारे पर स्थान दिया है | बहुत बहुत बधाई |

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