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08 July, 2013

"प्रकृति / मानव" पे अरुण निगम से रविकर की बहस-

openbooksonline.com पर




मानव  कहता  दम्भ में , मैं सबसे बलवान
किंतु प्रकृति के सामने  बिखरा है अभिमान
बिखरा  है  अभिमान ,  हुआ ऐसा बरसों से
निर्मित हुआ पहाड़ , बताओ  कब सरसों से
दम्भ और अभिमान , बना  देता  है  दानव
अदना-सा तू जीव , धरा पर  केवल  मानव ||



सिक्का मानव का चले, बनती प्रकृति गुलाम |
कारस्तानी के कहाँ, कभी चुकाए  दाम |   
कभी  चुकाए  दाम, क्लोन से सृष्टि चलाये |
अन्तरिक्ष आवास, वृष्टि भी कहीं कराये |
अजर अमर हो जाय, तुरुप का बनता इक्का |
रही प्रकृति घबराय, देखकर साहस सिक्का ||

आदरणीय रविकर जी,
सिक्का  किसका  चल  सका , आये  कई महान
कई   स्वयं-भू  कह  गये , खुद  को  ही भगवान
खुद  को   ही   भगवान ,  चार  दिन  जैसे  बीते
हुये  मृदा  में  लीन  ,   नहीं  कुदरत   से   जीते
महल  ताश  का   ढेर , तुरुप  हो  या  हो  इक्का
सब क्षणभंगुर अरुण,चल सका किसका सिक्का  ||

 आदरणीय भाई जी-

असली खलनायक यह कुदरत ही है मानव सीधा -सच्चा -

पेट मरोड़ करे धरती, करती तब उच्च पहाड़ खड़े |
निर्झर स्रोत नदी वन औषधि धातु धरोहर जीव बड़े |
पाय महा वरदान भला जब खाय नहीं तब पाप पड़े |
मानव बुद्धि प्रयोग करे प्रकृती-जड़ क्रोधित क्यूँ अकड़े ||

 आदरणीय रविकर जी, तनिक हमरो  सुनव.........
मानव खूब गुमान करे,रहता मद में अकड़ा-अकड़ा
जाल बुने झट टूट पड़े, जस टूट पड़े मकड़ी -मकड़ा
भूल गया क्षण भंगुर हूँ,करता झगड़ा रगड़ा लफड़ा
भान करावत है वसुधा, तब मूढ़ रहे असहाय खड़ा ||


  आदरणीय भाई जी-
सूरज चाँद गुरूर दिखे लहरें रतनाकर मार गई |
प्लेट रही टकराय धरा हिल जाय मिटाय हजार गई |
उच्च सुनामि तबाह करे मनु कोशिश किन्तु उबार गई |
मानव दोष कहाँ इसमें घटना घर बार उजार गई ||

आदरणीय रविकर जी, दूसर सवइया भइया.........
कौन रखे गति वेग  नियंत्रित , सूरज चाँद घटा नदिया

वायु समुंदर हैं गतिशील , सभी अनुशासित ओ रसिया

जीव वनस्पति जंतु यहाँ,किसने कहिये नहिं मान दिया

मानव दोष सखा इतना  , इसने अनुशासन भंग किया |




  आदरणीय भाई जी-

जो उलका लुढ़का धरती पर, तांडव शंकर से करवाये |
नाश करे खुशियाँ मनु की कुल मानव डर से मर जाए |
नोच रहा कुछ रत्न कहीं, खुशियाँ घर में गर वापस लाये |
चार मिले दिन मात्र उसे, प्रकृती सुख चैन मिटावत जाए ||

आदरणीय रविकर जी, ई रहा सवैया नम्बर....
3.

गोद हिमालय की सुख शांति समाधि निहार्थ बनी सुन भाई
काट  पहाड़  दिये  मनु  ने , वन  पाट दिये वसुधा अकुलाई
बाँध  दिया  बहती  नदिया , बरसी  बरखा  सरिता बलखाई
ताण्डव  मानव ने  करके , सुनिये  यह आफत आप बुलाई ||

 घनघोर रची सब पंक्ति प्रभो मनु अंतर से त्रुटि मान रहा  |
करता-धरता जब ईश्वर है, ऋषि सीख यही सच जान रहा  |
अफरा-तफरी अब रोज मचे, मनु काह करे जग खान रहा  |
प्रकृती त्रुटि क्यूँ नहिं माफ़ करे, मनु ही इसकी जब शान रहा |     


बहुत सुन्दर प्रतिक्रिया सवैये आदरणीय भाई जी-
आभार \ -
सत्य  को प्रणाम -
जय  श्री  राम
सादर 


सदस्य टीम प्रबंधन


मुग्ध करें मन छंद सुना रचना रच खूब कमाल किया
छंद प्रयास कमाल दिखे प्रतिछंद रचाय धमाल किया
सुन्दर यास कहूँ इसको पद में बतियान बवाल किया  
बाँचिक पाठक भक्क् हुये, मनभाव प्रबुद्ध निहाल किया
जय जय
सादर
मुग्ध  हुआ  मन सौरभ जी प्रतिछंद कहें महके-महके
सुंदर  बात  कही   हमसे  सुन पाँव  चलै  बहके-बहके
छेड़ "दिनेश" गये  जबसे  इत आग हिया भभके-दहके
शांत  हुआ मन मान लिया  त्रुटि अंतर से हमसे कहके ||
जय हो...................
आदरणीय भाई जी एक शंका और-निवारण कीजिये-
आभार लीजिये-
सादर
मानव का क्या दोहना, ना आया था रास |
महामारियों ने हना, मध्यकाल में ख़ास |
मध्यकाल में खास, तनिक घर-खेत बनाए |
बसा लिया परिवार, बुद्धि-बल खुशियाँ लाये |
पर कुदरत का कहर, टूट पड़ता बन दानव |
मानव था निर्दोष, मरा पर फिर क्यूँ मानव ||  
आदरणीय रविकर जी.........

जीने मरने  पर  यहाँ , रखे  नियंत्रण कौन

ज्ञानी ध्यानी सब रहे , इसी प्रश्न पर मौन

इसी प्रश्न पर मौन , अमरता किसने पाई

आया  वह है  गया , सत्य  इतना ही भाई

जीवन भर संघर्ष  ,  किया है यहाँ सभी ने

विधि का यही विधान,मौत नहिं देती जीने ||

13 comments:

  1. गज़ब की प्रस्तुति , बहुत खूब

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  2. गज़ब की प्रस्तुति , बहुत खूब

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  3. आपकी रचना कल बुधवार [10-07-2013] को
    ब्लॉग प्रसारण पर
    कृपया पधार कर अनुग्रहित करें |
    सादर
    सरिता भाटिया

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  4. बहुत ही सुन्दर ,आभार।

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  5. Bhai Ravikar ji apko aur nigam sahab ko padh kr bahut hi aanand aaya main to chahuga ki ye bahas aanant kal tk chalti rhe .

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  6. बंदीजुगल अरुण-

    रवि की है भैया बेजोड़ .

    कर जोरिकर कहूं , न करूं ठिठोली .

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  7. वाह ! बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति , लाजवाब

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  8. मानव और प्रकृति को लेकर समस्या को बहुत अच्छी करह उठाया है .आदमी अपने दंभ में विवेकहीन होगया है प्रकृति को कुछ नहीं समझना .लेकिन प्राकृतिक प्रकोप के आगे वह लाचार हो जाता है .
    बढ़िया निरूपण!

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  9. वाह . बहुत उम्दा

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  10. सुन्दर बहंस ,अलग अंदाज़ की प्रस्तुति

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  11. क्या खूबसूरत वाद प्रतिवाद । अंततः प्रकृति ही जीतती है जीव तो आने जाने हैं ।
    बहुत आनंद आया इस जुगलबंदी में ।

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  12. बहुत खूबसूरत वाद प्रतिवाद । अंततः प्रकृति ही जीतती है जीव को तो आना जाना है ।

    बहुत आनंददायक जुगलबंदी ।

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