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20 August, 2013

हारे भारत दाँव, सदन हत्थे से उखड़े-




   उखड़े मुखड़े पर उड़े, हवा हवाई धूल ।
आग मूतते हैं बड़े, गलत नीति को तूल । 
 
गलत नीति को तूल, रुपैया सहता जाए । 
डालर रहा डकार, कौन अब लाज बचाए । 

बहरा मोहन मूक, नहीं सुन पाए दुखड़े । 
हारे भारत दाँव, सदन हत्थे से उखड़े ॥ 


गिरता है गिरता रहे, पर पाए ना पार |
रूपया उतना ना गिरे, जितना यह सरकार |


जितना यह सरकार, नरेगा नरक मचाये |
बस पनडुब्बी रेल, मील मिड डे भी खाए |


लेता फ़ाइल लील, सदन में भुक्खड़ फिरता |
मँहगाई में डील, रुपैया नेता गिरता ||

 
 रोके से ना रोकड़ा, ले रुकने का नाम ।
रुपिया रूप कुरूप हो, मचा रहा कुहराम । 

मचा रहा कुहराम, हुआ अब राम भरोसे । 
मँहगाई की मार, गरीबी जीवन कोसे । 

कह गरीब के साथ, हाथ नित बम्बू ठोके । 
डालर हँसता जाय, रहे पर रुपिया रो के ॥ 

7 comments:

  1. बहुत ही सुंदर,रक्षा बंधन की हार्दिक बधाई व शुभकामनाएँ !

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  2. बहुत सही कहा श्रीमान

    कविता

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  3. बेहतरीन सर जी बहुत ख़ूब

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  4. बहुत ख़ूब ,सही कहा श्रीमान

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  5. प्रभावशाली कुंडलियाँ !!

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  6. रुपया पुराण बेहतरीन रहा .

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  7. बहुत ही यथार्थ परक और सुंदर.

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