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21 August, 2013

उनको सुवर हराम, अहिंसा अपने आड़े-

"पक्के-बाड़े" में पिले , जबसे सु-वर तमाम । 
मल-मलबा से माल तक, खाते सुबहो-शाम । 

खाते सुबहो-शाम, गगन-जल-भूमि सम्पदा ।
करें मौज अविराम, इधर बढ़ रही आपदा । 

उनको सुवर हराम, अहिंसा अपने आड़े । 
"मत" हिम्मत से मार, शुद्ध कर "पक्के-बाड़े" ।।

4 comments:

  1. गजब लिखा, शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  2. बाड़े बहुत पक्‍के कर दिए गए हैं। इनके अन्‍दर जाना बहुत कठिन जान पड़ता है।

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  3. उनको सुवर हराम, अहिंसा अपने आड़े... bahut jabardast kataksh..

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  4. सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति.

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