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24 August, 2013

चूर गर्व मुंबई का, करे कलंकित दुष्ट-

डालर डोरे डालता, अर्थव्यवस्था कैद |
पुन:विदेशी लूटते, फिर दलाल मुस्तैद-
हर दिन बढ़ता घाटा है |
झूठा कौआ काटा है |

होय कोयला लाल जो, बचे शर्तिया राख |
गायब होती फाइलें, और बचाते  साख -
माँ-बेटे ने डाटा है ?
झूठा कौआ काटा है |

रहा रुपैये का बिगड़, धीरे धीरे रूप |
करे ख़ुदकुशी अन्ततः, कूदे गहरे कूप |
यूँ छाता सन्नाटा है |
झूठा कौआ काटा है ||

भोलू-भोली भूलते, रहा नहीं कुछ याद । 
याददाश्त कमजोर है, टू-जी की बकवाद । 
यह भी बिरला टाटा है । 
झूठा कौआ काटा है ||

चूर गर्व मुंबई का, करे कलंकित दुष्ट । 
शर्मिंदा फिर देश है, हुवे आम जन रुष्ट । 
पौरुषता पर चाटा  है
झूठा कौआ काटा है ||

काट रहे चालान जो, चलते टेढ़ी चाल |
रहे कुचलते जो सदा, करते खड़े सवाल |
कार भरे फर्राटा है । 
झूठा कौआ काटा है ||

नमो नमो नरदन नयक, निश्चय नव-नरनाह । 
असुर-शक्ति की हार हो, जन जन में उत्साह
दुष्ट कलेजा फाटा है ।
झूठा कौआ काटा है ||

नरदन=नाद करना /गरजना 
नयक=नीति में कुशल 




6 comments:

  1. बहुत ही सटीक और लाजवाब.

    रामराम.

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  2. नेटवर्क की सुविधा से लम्बे समय से वंचित रहने की कारण आज विलम्ब से उपस्थित हूँ !
    भाद्र पट के आगमन की वधाई !!
    रविकर जी !अच्छी प्रस्तुति है !!

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  3. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति आदरणीय ''रविकर'' सर जी
    हरेक अल्फ़ाज़ वास्तविकता से ओत-प्रोत, लेखनी को पढ़ मन प्रसन्न हुआ

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  4. बेहद सशक्त भाव बोध राजनीति बोध की रचना .

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