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17 September, 2013

ले पहले घर देख, ताकना फिर मस्जिद में-

फिर भी दिल्ली दूर है, नहीं राह आसान |
अज्ञानी खुद में रमे, परेशान विद्वान |

परेशान विद्वान, बड़े भी अपनी जिद में |
पहले निज घर ताक, ताकना फिर मस्जिद में | 

डंडे से ही खेल, नहीं पायेगा गिल्ली |
आस-पास बरसात, तरसती फिर भी दिल्ली || 

(आज के राजनैतिक माहौल पर)
नीले रंग में मुहावरे हैं-


4 comments:

  1. आपकी यह रचना कल बुधवार (18-09-2013) को ब्लॉग प्रसारण : 120 पर लिंक की गई है कृपया पधारें.
    सादर
    सरिता भाटिया
    गुज़ारिश

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  2. क्या बात क्या बात , जबरदस्त भाव पहले निज घर ताक, ताकना फिर मस्जिद में | .. बहुत कटु यथार्थ कह दिया , काश ये समझ आये जिन्हें समझना चाहिए.

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  3. बहुत खूब , शब्दों की जीवंत भावनाएं... सुन्दर चित्रांकन

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