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05 September, 2013

गुरुजन रहे खिलाय गुल, गुलछर्रे गुट बाल

गुरु-गुरुता गायब गजब, अजब आधुनिक काल । 

गुरुजन रहे खिलाय गुल, गुलछर्रे गुट बाल । 


गुलछर्रे गुट बाल, चाल चल जाय अनोखी । 

नीति नियम उपदेश, लगें ना बातें चोखी । 


बढ़े कला संगीत, मिटे ना लेकिन पशुता । 

भरा पड़ा साहित्य, नहीं कायम गुरु-गुरुता ॥

3 comments:

  1. वाह। वाकई नहीं है कायम गुरु-गुरुता।

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  2. गुलछर्रे गुट बाल, चाल चल जाय अनोखी ।

    नीति नियम उपदेश, लगें ना बातें चोखी ।
    wah kya bat hai sundar kataksh .....badhai Ravi ji .

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  3. स्वाभिक मनोवेदना से ओत प्रोत हल्का हास्य सराहनीय मित्र !

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