Follow by Email

09 September, 2013

मिटता क्यूँ अस्तित्व, पड़े नहिं रविकर पल्ले -

पल्ले-चौखट-चौकियाँ, पहिया गाड़ी नाव |
औषधि पत्ती-फूल-फल, मिले वृक्ष से छाँव |

मिले वृक्ष से छाँव, शुद्ध कर प्राण-वायु दे |
किन्तु शहर वन गाँव, प्राणि-जग आँखे मूंदे |

खेलकूद त्यौहार, शादियाँ इसके तल्ले |
फिर क्यूँ मिटते वृक्ष, पड़े नहिं रविकर पल्ले ||

4 comments:

  1. बेहतरीन प्रस्‍तुति

    ReplyDelete
  2. बहुत ही बेहतरीन और सटीक प्रस्तुति,आभार।

    ReplyDelete
  3. आपकी यह रचना कल बुधवार (11-09-2013) को ब्लॉग प्रसारण : 113 पर लिंक की गई है कृपया पधारें.
    सादर

    ReplyDelete