Follow by Email

25 October, 2013

दशरथ बाल-कथा -- : भगवती शांता


 भाग-2   
घनाक्षरी 

  दीखते हैं मुझे दृश्य मनहर चमत्कारी
कुसुम कलिकाओं से वास तेरी आती है । 

कोकिला की कूक में भी स्वर की सुधा सुन्दर  
प्यार की मधुर टेर सारिका सुनाती है । 

देखूं शशि छबि भव्य  निहारूं अंशु सूर्य की - 
रंग-छटा उसमे भी तेरी ही दिखाती है | 

कमनीय कंज कलिका विहस 'रविकर' 
तेरे रूप-धूप का ही सुयश फैलाती है ||

 दोहा  
इंदुमती के प्रेम में, भूपति अज महराज |
लम्पट विषयी जो हुए, झेले राज अकाज ||1||

गुरु वशिष्ठ की मंत्रणा, सह सुमंत बेकार |
इंदुमती के प्यार ने, दूर किया दरबार ||2|| 

क्रीड़ा सह खिलवाड़ ही, परम सौख्य परितोष | 
सुन्दरता पागल करे, मन-मानव मदहोश ||3|| 

अति सबकी हरदम बुरी, खान-पान-अभिसार | 
क्रोध-प्यार बड़-बोल से,  जाय जिंदगी हार ||4||  

झूले  मुग्धा  नायिका, राजा  मारे  पेंग |
वेणी लागे वारुणी,  रही दिखाती  ठेंग ||5||

राज-वाटिका  में  रमे, चार पहर से आय |
तीन-मास के पुत्र को, धाय रही बहलाय ||6||

नारायण-नारायणा,  नारद निधड़क नाद |
अवधपुरी के गगन पर, स्वर्गलोक संवाद ||7||

वीणा से माला सरक, सर पर गिरती आय ।
 इंदुमती वो अप्सरा, जान हकीकत जाय ।।8||

एक पाप का त्रास वो, यहाँ रही थी भोग |
स्वर्ग-लोक पत्नी गई, अज को परम वियोग ||9||

माँ का पावन रूप भी, उसे सका ना रोक |
तीन मास के लाल को, छोड़ गई इह-लोक ||10||  

विरह वियोगी जा महल, कदम उठाया गूढ़ |
भूल पुत्र को कर लिया, आत्मघात वह मूढ़ ||11| 

कुण्डलियाँ 
उदासीनता की तरफ, बढ़ते जाते पैर ।
रोको रविकर रोक लो,  जीवन से क्या बैर ।   
जीवन से क्या बैर, व्यर्थ ही  जीवन त्यागा ।
किया पुत्र को गैर,  करे क्या पुत्र  अभागा  ?
दर्द हार गम जीत,  व्यथा छल आंसू हाँसी ।
जीवन के सब तत्व, जियो जग छोड़ उदासी ।। 

 दोहा  
प्रेम-क्षुदित व्याकुल जगत, मांगे प्यार अपार |
जहाँ  कहीं   देना   पड़े, करे व्यर्थ तकरार ||

कुण्डलियाँ 
मरने से जीना कठिन, पर हिम्मत मत हार ।
 कायर भागे कर्म से, होय नहीं उद्धार । 
होय नहीं उद्धार, चलो पर-हित कुछ साधें ।
 बनिए नहीं लबार, गाँठ जिभ्या पर बांधें ।
फैले रविकर सत्य, स्वयं पर जय करने से । 
 जियो लोक हित मित्र, मिले नहिं कुछ मरने से ।।   

 दोहा  
माता की ममता छली, करता पिता अनाथ |
रोय-रोय शिशु हारता, पटक-पटक के माथ ||12||

1 comment:

  1. बहुत दिनों के बाद में , हुआ कृतार्थ आज |
    यह रचना साहित्य के, सिर का सचमुच ताज ||
    आपकी यह गवेषणात्मक खोज धर्म की पुस्तक में एक सराहनीय पृष्ठ है !

    ReplyDelete