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26 October, 2013

कौशल्या-दशरथ ; भगवती शांता ;मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सगी बहन


भाग-3 
कुण्डलियाँ 

 दुख की घड़ियाँ सब गिनें, घड़ी-घड़ी सरकाय ।
धीरज हिम्मत बुद्धि बल, भागे तनु विसराय ।
भागे तनु विसराय, अश्रु दिन-रात डुबोते ।
रविकर मन बहलाय, स्वयं को यूँ ना खोते ।
समय-चक्र गतिमान, मिलाये सुख की कड़ियाँ ।
मान ईश का खेल, बिता ले दुख की घड़ियाँ ।। 

दोहा 

क्रियाकर्म विधिवत हुआ, तेरह-दिन का शोक ।
आसमान शिशु ताकता, खाली महल बिलोक ||13||  

आँसू बहते अनवरत, गला गया था बैठ |
राज भवन में थी सदा, अरुंधती की पैठ ||14|

पत्नी पूज्य वशिष्ठ की, सादर उन्हें प्रणाम |
 विकट समय में पालती, माता सम अविराम ||15||

 महामंत्री सुमंत को, बुलवाते गुरु  पास |
लालन-पालन की करें, वही व्यवस्था ख़ास ||16||

महागुरू मरुधन्व के, आश्रम में तत्काल |
 गुरु-आज्ञा से ले गए, व्याकुल दशरथ बाल ||17||

जहाँ नंदिनी पालती, बाला-बाल तमाम |
बढ़े पुष्टता दुग्ध से, बुद्धि बढ़े नितराम  ||18||

 कामधेनु की कृपा से, होती इच्छा पूर |
देवलोक की नंदिनी, है आश्रम की नूर ||19||

दक्षिण कोशल सरिस था, उत्तर कोशल राज |
सूर्यवंश के ही उधर, शासक रहे विराज ||20||

राजा अज की मित्रता, का उनको था गर्व |
 दुर्घटना से अति-दुखी, राजा-रानी सर्व ||21||

अवधपुरी आने लगे, प्राय: कोसलराज |
राज-काज बिधिवत चले, स्वागत करे समाज  ||22|| 

राजकुमारी वर्षिणी, रानी आती संग ।  
 हों प्रयत्न उनके सफल, भरे अवध नवरंग ।23। 

धीरे-धीरे बीतता, दुख से बोझिल काल |
राजकुँवर भूले व्यथा, बीत गया वह साल |24|

दूध नंदिनी का पिया, अन्नप्राशनी-पर्व |
आश्रम से वापस हुए, अति-आनंदित सर्व |25|

ठुमुक-ठुमुक कर भागते, छोड़-छाड़ पकवान |
दूध नंदिनी का पियें, आता रोज विहान |26|

उत्तर कोशल झूमता, नव कन्या मुसकाय |
पिता बने भूपति पुन:, फूले नहीं समाय |27|

  बच्चों को लेकर करें, अवध पुरी की सैर |
राजा-रानी नियम से, लेने आते खैर |28|

कन्या कौशल्या हुई,  दशरथ राजकुमार  |  
 नामकरण उत्सव हुवे,  धरते गुण अनुसार |29।

विधिवत शिक्षा के लिए, फिर से राजकुमार |
कुछ वर्षों के बाद पुनि, जाते गुरु-आगार |30|

अच्छे योद्धा बन गए, महाकुशल बलवान|
दसों दिशा रथ  हाँकले, बने अवध की शान |31| 

शब्द-भेद संधान से, गुरु ने किया अजेय |
अवधपुरी उन्नत रहे, बना एक ही ध्येय |32|  

राजतिलक विधिवत हुआ, आये कौशल-राज | 
राजकुमारी साथ में, हर्षित सकल समाज |33| 

बचपन का वो खेलना,  छीना झपटी स्वाँग   |
इक दूजे को स्वयं से, मन ही मन लें माँग ।34।

4 comments:

  1. अद्भुद, सरल और ग्राह्य दोहावली। आभार श्रीमंत।

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  2. क्‍या बात पढ़कर बहुत अच्‍छा लगा।............मान ईश का खेल, बिता ले दुख की घड़ियाँ ।। .......क्‍या धैर्यवान बात है।

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  3. दशरथ का मातृवियोग दशरथ कौशल्या का बचपन सब सुंदर वर्णन। आपकी कुण्डली तो सोने पे सुहागा।

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