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03 October, 2013

देह चाहती मेह पर, होवे "रविकर" *रेह

 प्रभु से जो डरकर चले, होय नहीं पथभ्रष्ट |
किन्तु दुष्ट रोमांच हित, चले बाँटते कष्ट ||1||

"आकांक्षा के पर क़तर, तितर बितर कर स्वप्न |
दें अपने ही दुःख अगर, निश्चय बड़े कृतघ्न || 2||

माटी का पुतला पुन:, माटी में मिल जाय |
फिर भी माटी डाल मत, कर उत्थान उपाय ||3||

राजनीति जब वोट की, अपने अपने स्वार्थ |
संविधान बीमार है, मोहग्रस्त है पार्थ || 4||

जीवन की संजीवनी, हो हौंसला अदम्य |
दूर-दृष्टि, प्रभु कृपा से, पाए लक्ष्य अगम्य ||5||

धर्म होय हठधर्म जब, कर्म होय दुष्कर्म |
शर्म होय बेशर्म तब, भेदे नाजुक मर्म ||6||

रहो इधर या उधर तुम, रहना मत निष्पक्ष |
डुबा अन्यथा दें तुम्हें, उभय पक्ष अति-दक्ष || 7||

देह नेह दुःख गेह है, किंचित नहिं संदेह |
देह चाहती मेह पर, होवे "रविकर"  *रेह ||8||

खार मिली हुई मिटटी / ऊसर


6 comments:

  1. वाह, बहुत ही सटीक और सारगर्भित.

    रामराम.

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  2. वाह...
    बेहतरीन प्रस्तुति..

    सादर
    अनु

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  3. "रविकर" जी की सुन्दर प्रस्तुति ..

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  4. आपकी यह सुन्दर रचना दिनांक 04.10.2013 को http://blogprasaran.blogspot.in/ पर लिंक की गयी है। कृपया इसे देखें और अपने सुझाव दें।

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  5. आदरणीय, उत्कृष्ट दोहों के लिये बधाइयाँ...........

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