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07 July, 2014

रक्त-स्वेद दोनों रिसे, धत गरीब की जात-

बजट से पहले हलुआ


अमर उजाला

तलुआ चप्पल के घिसे, पिसे सदा दिन-रात |
रक्त-स्वेद दोनों रिसे, धत गरीब की जात |

धत गरीब की जात, नहीं औकात हमारी |
कबहूँ नहीं अघात, घात हम पर सरकारी |

कह रविकर कविराय, चाटते नेता हलुआ |
चमचे भी दो चार, चटाते चाटे तलुआ ||

10 comments:

  1. नेताओं की तो बात ही क्या है ...

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  2. नेता और चमचों के पेट कभी नहीं भरता...
    बहुत खूब!

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  3. क्या बात, बहुत सुंदर

    रेल बजट में नहीं दिखा 56 इँच का सीना !
    http://aadhasachonline.blogspot.in/

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  4. क्‍या बात है ..... बहुत ही बढिया

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  5. भोर करी पदयात्रा गाँव की, फूलन के लिए हार सलोने
    टीवी में देख छवि अपनी ,मुस्काय चले प्रभु चैन से सोने

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  6. बहुत खूब बहुत खूब बहुत खूब -चमचे भी दो चार चटाते तलुवा

    नेता मेरा भडुवा

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  7. बहुत सुदर, सटीक और सामयिक।

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