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04 September, 2014

दिखी तड़पती हूर, कहे लंकाई दिलशन-



मन्नत मांगे बौद्ध दिल, रख  जन्नत से दूर |
देख रहा ईराक में, दिखी तड़पती हूर |

दिखी तड़पती हूर, कहे लंकाई दिलशन |
वह पाकी शहजाद, उजाड़े प्यारा गुलशन |

कैसा यह इस्लाम, और यह कैसी सुन्नत |
जगत चुकाए दाम, शान्ति की मांगे मन्नत ||

9 comments:

  1. जन्नत की चाह किसे है यहाँ तो हर कोई शान्ति चाहता है और धरती पर शान्ति होगी तो यह धरती ही जन्नत होगी !

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  2. आपकी लिखी रचना शनिवार 06 सितम्बर 2014 को लिंक की जाएगी........
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  3. मित्र बहुत दिन के बाद भेंट हो रही है ! कुण्डलिया अच्छी है !

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  4. शान्ति की मांगे मन्नत ||
    beautifully penned

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  5. जगत चुका रहा दाम !
    यथार्थपरक !

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