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06 August, 2014

हर लोटे में मिर्च, शौच के रविकर लोटे-

लोटे जनता भूमि पर, हँसते दहशतगर्द |
देखे राह कराह के, बच्चे औरत मर्द |

बच्चे औरत मर्द, शर्तिया सर्द युद्ध है |
हैं जालिम बेदर्द, कालिका महाक्रुद्ध है |

भोगे भारत श्राप, कलेजा टोटे टोटे |
हर लोटे में मिर्च, शौच के रविकर लोटे ||

13 comments:

  1. गनीमत है बस मिर्च है नमक की कमी और है । सुंदर ।

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  2. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (08.08.2014) को "बेटी है अनमोल " (चर्चा अंक-1699)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

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  3. बहुत जबर्दस्‍त कटाक्ष व्‍यवस्‍था पर।

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  4. बहुत धारदार कुंडलिया लिखी है आपने।
    आभार।

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  5. सुन्दर रचना...हाहाहा

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  6. वाह सोचके और शौच के लौटे में मिर्च

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  7. सुंदर है ,शुक्रिया आपकी टिप्पणियों का .

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  8. बहुत सुंदर रचना

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  9. हर बार नया आनंद देती यह सार्थक रचना शुक्रिया रविकर भाई आपके नेहा का टिप्पणियों का स्थान देते लिए।

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